Thursday, 7 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

महाराज दशरथ और कैकेयी के विवाह में काम और लोभ के समझौते के बाद क्रोध की क्या स्थिति है ? मन्थरा कैकेयी की दासी है । वह कुरूप है, उपेक्षा की पात्र है और हीनवृत्ति से पीड़ित हैं । ऐसी स्थिति में मन्थरा कैकेयी के साथ अयोध्या में आती है । अयोध्या के लोग उसकी कुरुपता पर हँसते हैं । और उसका परिणाम क्या हुआ ? उसके मन में प्रतिक्रिया उत्पन हुई । वह चिड़चिड़ी हो गई । यह एक स्वाभाविक परिणाम है । इस चिड़चिड़ेपन के कारण लोग उसकी निन्दा करते हैं । लेकिन अगर विचार करके देखें तो कुरूप व्यक्ति को चिड़चिड़ा बनाता कौन है ? तो उसे चिड़चिड़ा बनाने का दोष तो दूसरे व्यक्तियों का ही है । जब हम किसी की कुरुपता पर हँसेंगे या व्यंग्य करेंगे, उसे उपेक्षा की दृष्टि से देखेंगे, हँसी का पात्र समझेंगे, तो क्या उसके मन में प्रतिक्रिया उत्पन नहीं होगी ? वह तो कोई बिरला ही व्यक्ति होगा, जो इस घृणा की वृत्ति में भी आनन्द ले ।

Wednesday, 6 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

अयोध्या में सारी समस्या कैसे उत्पन्न हुई । महाराज दशरथ के चरित्र में कमी के कारण । और वह कमी थी असंतुलित काम की । सौन्दर्य के प्रति आसक्ति तथा राग उनके जीवन में बहुत तीव्र था और उस राग का परित्याग वे अपने जीवन में नहीं कर पाए । इसी कारण उन्होंने दो और विवाह किए । उन विवाहों के पीछे उनके मन में यह तर्क था कि वे उत्तराधिकारी के लिए ही विवाह कर रहे हैं । पर उनके पूरे चरित्र को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने कैकेयी के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर ही विवाह की इच्छा की थी । उन्होंने सुन लिया था कि कैकेयी अत्यंत रूपवती है । और जब उन्होंने कैकय नरेश के सामने कैकेयी से विवाह करने की अपनी इच्छा व्यक्त की तो कैकय नरेश ने उनके सामने शर्त रखी कि मैं अपनी कन्या का विवाह आपसे तभी करुँगा, जब आप यह वचन दे देंगे कि मेरी कन्या के गर्भ से जन्म लेने वाला पुत्र ही अयोध्या के राजसिंहासन का उत्तराधिकारी होगा । तो इसका अभिप्राय क्या हुआ ? यह कि महाराज दशरथ के काम एवं महाराज कैकय के लोभ में समझौता हो गया और इसके बाद महाराज दशरथ का कैकेयी से विवाह हुआ ।

Tuesday, 5 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सारी अयोध्या की समस्या पर विचार करें, तो देखेंगे कि अयोध्या का सारा समाज काम, क्रोध, लोभ - तीनों से ग्रस्त हो गया है, सन्निपात ग्रस्त हो गया है । पर श्रीभरत ने केवल काम की चर्चा की । उन्होंने कहा कि इस समय अयोध्या में वात रोग हुआ है । और रामचरितमानस की भाषा में काम ही वात रोग है -
    काम वात कफ लोभ अपारा ।
तो श्रीभरतजी ने यहाँ पर जो केवल काम को महत्व दिया, इसका अभिप्राय यह है कि काम, क्रोध और लोभ इन तीनों पर विचार करके देखें तो सबके मूल में काम है । अगर पूरे घटनाक्रम पर विचार करें तो आपको लगेगा कि पहले काम वात आया, उसके बाद क्रोध कफ, और अन्त में क्रोध रूपी पित्त भी आया । इस प्रकार सारा समाज सन्निपात ग्रस्त हो गया ।

Monday, 4 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गुरु वसिष्ठ समाज की समस्या को आपात दृष्टि से देखते हैं और उसका तात्कालिक समाधान प्रस्तुत करते हैं । वे मानो लक्षणों की चिकित्सा कर रहे हैं । महाराज दशरथ की मृत्यु हो चुकी है, श्रीराम वन को चले गए हैं । ऐसी स्थिति में शासकविहीन समाज में शासनतन्त्र सुव्यवस्थित नहीं रह पाएगा । गुरु वसिष्ठ की दृष्टि से इसका समाधान यही है कि भरत सिंहासन पर बैठकर समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलावें । तो देखने में तो यह समाधान गलत नहीं लगता, लेकिन श्रीभरत कहते हैं कि यह जो जल्दी में लिया गया निर्णय है, क्या सचमुच इसके द्वारा समाज की समस्या का समाधान होगा ? आप लोगों ने तो देख ही लिया है कि पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीताजी और श्रीराम वन में हैं और मुझे आप राज्य करने के लिए कह रहे हैं । इसमें आप मेरा कोई कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम होने की आशा रखते हैं । अब आप ही बताइए कि जिसके सिंहासन पर बैठने पूर्व ही इतनी अशुभ घटनाएँ घट गयी हों, तो आगे क्या होगा ? जिसके सिंहासन में बैठने के पूर्व ही पिता और लोकशासक को प्राण त्यागने के लिए बाध्य होना पड़ा हो, जिसे सिंहासन षड्यंत्र से मिला हो और जिसके कारण श्रीराम को वन जाना पड़ा हो, जिस सिंहासन से ईश्वर दूर चला गया हो, उस सिंहासन पर बैठने वाला शासक क्या समस्याओं का समाधान दे सकता है ? आप लोग इस पर गम्भीरता से विचार करें - मैं सत्य कहता हूँ, आप लोग विश्वास करें, धर्मशील को ही राजा होना चाहिए ।

Sunday, 3 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

.....कल से आगे .....
श्रीभरत गुरु वसिष्ठ के चिकित्सा पद्धति से सहमत नहीं होते । जब कौशल्या अम्बा ने देखा कि श्रीभरत इस प्रस्ताव से रंचमात्र भी उत्साहित नहीं हो रहे हैं, अपितु गुरुजी का प्रस्ताव सुनकर उन्हें दुख हो रहा है तब उन्होंने तुरन्त कहा - भरत ! जब वैद्य कोई पथ्य बतावे, कोई दवा बतावे तो यह आवश्यक नहीं है कि वह हमारे मन के अनुकूल ही हो । पथ्य तो बहुधा मन के अनुकूल नहीं हुआ करता । इस समय सारा समाज रोगी है और स्वस्थ होने के लिए गुरु द्वारा दिया गया पथ्य तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिए । इसी से समाज की समस्या का समाधान होगा । सचमुच क्या वह निदान सही था ? क्या औषधि और पथ्य सही था ? तब श्रीभरत ने उसका विश्लेषण किया । गुरु वसिष्ठ की व्यवस्था को वे कुपथ्य मानते हैं । श्रीभरत के कहने का तात्पर्य यह है कि अगर मैं सिंहासन पर बैठ गया, तब तो लोगों को षड्यंत्र और धूर्तता की ही प्रेरणा मिलेगी । असत्य और कठोरता की ही प्रेरणा मिलेगी । लोग यही सोचेंगे कि मंथरा और कैकेयी ने मिलकर ऐसी योजना बनाई और षड्यंत्र रहा कि भरत सिंहासन पर बैठ गए । अगर मेरे द्वारा समाज में मन्थरा और कैकेयी के उद्देश्य की पूर्ति हो जाय तो समाज स्वस्थ होगा या अस्वस्थ ? आज भी यही दिखाई देता है कि कोई बुरा व्यक्ति सफलता प्राप्त कर लेता है और अच्छे व्यक्ति को लोग असफल होते देखते हैं तो बहुतों के मन में यह बात आती है कि शायद अच्छा होने पर बुरा फल भोगना पड़ता है । तो बुरे व्यक्ति की सफलता तो दूसरे व्यक्ति को भी बुराई की ही प्रेरणा देगी ।

Saturday, 2 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत की दृष्टि वैद्य की दृष्टि है और मन्थरा उनकी दृष्टि में एक रोगी की भाँति दया की पात्र है । इस पर विचार करके देखिए । मंथरा को निमित्त बनाकर अयोध्या में सन्निपात हो गया । वहाँ का सम्पूर्ण समाज सन्निपात ग्रस्त हो गया । और उसकी चिकित्सा श्रीभरत जैसे संत ने की । यद्यपि कौशल्या अम्बा को लगा कि सबसे योग्य चिकित्सक गुरु वसिष्ठ ही हैं । भई, अपने घर का बेटा अगर डाक्टर या वैद्य हो जाय तो माता-पिता को उस पर विश्वास नहीं होता । रामायण में सबसे बड़े वैद्य तो श्रीभरत ही हैं पर कौशल्या अम्बा तो उन्हें पुत्र की दृष्टि से देख रही थीं । उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि मेरा पुत्र इतना बड़ा वैद्य है । उन्होनें सोचा कि सारा समाज रोगी हो चुका है और इस रोग को दूर करने वाले वैद्य के रूप में हमारे कुल को गुरु वसिष्ठ जैसे संत और सद्गुरु मिले हैं, अतः समाज के रोग की चिकित्सा उनके द्वारा ही होना चाहिए । तब गुरु वसिष्ठ ने वैद्य की भूमिका स्वीकार कर ली और उन्होंने श्रीभरत से कहा कि तुम अयोध्या का राज्य स्वीकार कर लो और चौदह वर्ष तक राज्य चलाओ । राम के लौटने के पश्चात तुम उन्हें राज्य सौंप देना । पर श्रीभरत उनकी इन चिकित्सा पद्धति से सहमत नहीं होते ।
    .....आगे कल ....

Friday, 1 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

किसी वस्तु की प्राप्ति और उसकी प्राप्ति के सुख की अनुभूति दो अलग बातें हैं । गोस्वामीजी बड़ा ही सार्थक दृष्टांत देते हैं । जैसे विविध प्रकार के व्यंजन लाकर कोई रख दे ! तो व्यंजन तो मिल गया पर व्यंजन का सुख कब मिलेगा ? व्यंजन का सुख तब मिलेगा जब भूख भी लगी हो । यदि भूख न हो और मन्दाग्नि की शिकायत हो तो व्यंजन में रस नहीं मिलेगा । इसलिए व्यंजन के स्वाद की सुखानुभूति के लिए केवल व्यंजन मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है । इसी तरह वे कहते हैं कि श्रीराम के दर्शन से सब परम पद के योग्य तो हो गये पर कमी और किस बात की रह गई ? वही भूख की कमी और मन्दाग्नि के कारण यदि व्यंजन से अरुचि हो रही है तो व्यंजन परोसने के साथ-ही-साथ रोग भी दूर करना होगा । और श्रीभरत ने यही किया । भगवान श्रीराम के दर्शन से उन्हें मुक्ति का व्यंजन तो मिल गया, पर रोग दूर हुआ श्रीभरत की कृपा से । भरत जैसे वैद्य के द्वारा जब लोगों के मन रोग दूर हुआ, तब उन्हें मुक्ति सुख की प्रत्यक्ष अनुभूति हुई । यहीं भगवान श्रीराम और श्रीभरत के चरित्र में सामंजस्य है । तो श्रीभरत की भूमिका है वैद्य की और उन्होंने समस्त घटनाओं को देखा रोग के रूप में ।