Monday, 4 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

गुरु वसिष्ठ समाज की समस्या को आपात दृष्टि से देखते हैं और उसका तात्कालिक समाधान प्रस्तुत करते हैं । वे मानो लक्षणों की चिकित्सा कर रहे हैं । महाराज दशरथ की मृत्यु हो चुकी है, श्रीराम वन को चले गए हैं । ऐसी स्थिति में शासकविहीन समाज में शासनतन्त्र सुव्यवस्थित नहीं रह पाएगा । गुरु वसिष्ठ की दृष्टि से इसका समाधान यही है कि भरत सिंहासन पर बैठकर समाज को सुव्यवस्थित रूप से चलावें । तो देखने में तो यह समाधान गलत नहीं लगता, लेकिन श्रीभरत कहते हैं कि यह जो जल्दी में लिया गया निर्णय है, क्या सचमुच इसके द्वारा समाज की समस्या का समाधान होगा ? आप लोगों ने तो देख ही लिया है कि पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीताजी और श्रीराम वन में हैं और मुझे आप राज्य करने के लिए कह रहे हैं । इसमें आप मेरा कोई कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम होने की आशा रखते हैं । अब आप ही बताइए कि जिसके सिंहासन पर बैठने पूर्व ही इतनी अशुभ घटनाएँ घट गयी हों, तो आगे क्या होगा ? जिसके सिंहासन में बैठने के पूर्व ही पिता और लोकशासक को प्राण त्यागने के लिए बाध्य होना पड़ा हो, जिसे सिंहासन षड्यंत्र से मिला हो और जिसके कारण श्रीराम को वन जाना पड़ा हो, जिस सिंहासन से ईश्वर दूर चला गया हो, उस सिंहासन पर बैठने वाला शासक क्या समस्याओं का समाधान दे सकता है ? आप लोग इस पर गम्भीरता से विचार करें - मैं सत्य कहता हूँ, आप लोग विश्वास करें, धर्मशील को ही राजा होना चाहिए ।

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