किसी वस्तु की प्राप्ति और उसकी प्राप्ति के सुख की अनुभूति दो अलग बातें हैं । गोस्वामीजी बड़ा ही सार्थक दृष्टांत देते हैं । जैसे विविध प्रकार के व्यंजन लाकर कोई रख दे ! तो व्यंजन तो मिल गया पर व्यंजन का सुख कब मिलेगा ? व्यंजन का सुख तब मिलेगा जब भूख भी लगी हो । यदि भूख न हो और मन्दाग्नि की शिकायत हो तो व्यंजन में रस नहीं मिलेगा । इसलिए व्यंजन के स्वाद की सुखानुभूति के लिए केवल व्यंजन मिल जाना ही पर्याप्त नहीं है । इसी तरह वे कहते हैं कि श्रीराम के दर्शन से सब परम पद के योग्य तो हो गये पर कमी और किस बात की रह गई ? वही भूख की कमी और मन्दाग्नि के कारण यदि व्यंजन से अरुचि हो रही है तो व्यंजन परोसने के साथ-ही-साथ रोग भी दूर करना होगा । और श्रीभरत ने यही किया । भगवान श्रीराम के दर्शन से उन्हें मुक्ति का व्यंजन तो मिल गया, पर रोग दूर हुआ श्रीभरत की कृपा से । भरत जैसे वैद्य के द्वारा जब लोगों के मन रोग दूर हुआ, तब उन्हें मुक्ति सुख की प्रत्यक्ष अनुभूति हुई । यहीं भगवान श्रीराम और श्रीभरत के चरित्र में सामंजस्य है । तो श्रीभरत की भूमिका है वैद्य की और उन्होंने समस्त घटनाओं को देखा रोग के रूप में ।
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