.....कल से आगे .....
श्रीभरत गुरु वसिष्ठ के चिकित्सा पद्धति से सहमत नहीं होते । जब कौशल्या अम्बा ने देखा कि श्रीभरत इस प्रस्ताव से रंचमात्र भी उत्साहित नहीं हो रहे हैं, अपितु गुरुजी का प्रस्ताव सुनकर उन्हें दुख हो रहा है तब उन्होंने तुरन्त कहा - भरत ! जब वैद्य कोई पथ्य बतावे, कोई दवा बतावे तो यह आवश्यक नहीं है कि वह हमारे मन के अनुकूल ही हो । पथ्य तो बहुधा मन के अनुकूल नहीं हुआ करता । इस समय सारा समाज रोगी है और स्वस्थ होने के लिए गुरु द्वारा दिया गया पथ्य तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिए । इसी से समाज की समस्या का समाधान होगा । सचमुच क्या वह निदान सही था ? क्या औषधि और पथ्य सही था ? तब श्रीभरत ने उसका विश्लेषण किया । गुरु वसिष्ठ की व्यवस्था को वे कुपथ्य मानते हैं । श्रीभरत के कहने का तात्पर्य यह है कि अगर मैं सिंहासन पर बैठ गया, तब तो लोगों को षड्यंत्र और धूर्तता की ही प्रेरणा मिलेगी । असत्य और कठोरता की ही प्रेरणा मिलेगी । लोग यही सोचेंगे कि मंथरा और कैकेयी ने मिलकर ऐसी योजना बनाई और षड्यंत्र रहा कि भरत सिंहासन पर बैठ गए । अगर मेरे द्वारा समाज में मन्थरा और कैकेयी के उद्देश्य की पूर्ति हो जाय तो समाज स्वस्थ होगा या अस्वस्थ ? आज भी यही दिखाई देता है कि कोई बुरा व्यक्ति सफलता प्राप्त कर लेता है और अच्छे व्यक्ति को लोग असफल होते देखते हैं तो बहुतों के मन में यह बात आती है कि शायद अच्छा होने पर बुरा फल भोगना पड़ता है । तो बुरे व्यक्ति की सफलता तो दूसरे व्यक्ति को भी बुराई की ही प्रेरणा देगी ।
श्रीभरत गुरु वसिष्ठ के चिकित्सा पद्धति से सहमत नहीं होते । जब कौशल्या अम्बा ने देखा कि श्रीभरत इस प्रस्ताव से रंचमात्र भी उत्साहित नहीं हो रहे हैं, अपितु गुरुजी का प्रस्ताव सुनकर उन्हें दुख हो रहा है तब उन्होंने तुरन्त कहा - भरत ! जब वैद्य कोई पथ्य बतावे, कोई दवा बतावे तो यह आवश्यक नहीं है कि वह हमारे मन के अनुकूल ही हो । पथ्य तो बहुधा मन के अनुकूल नहीं हुआ करता । इस समय सारा समाज रोगी है और स्वस्थ होने के लिए गुरु द्वारा दिया गया पथ्य तुम्हें स्वीकार कर लेना चाहिए । इसी से समाज की समस्या का समाधान होगा । सचमुच क्या वह निदान सही था ? क्या औषधि और पथ्य सही था ? तब श्रीभरत ने उसका विश्लेषण किया । गुरु वसिष्ठ की व्यवस्था को वे कुपथ्य मानते हैं । श्रीभरत के कहने का तात्पर्य यह है कि अगर मैं सिंहासन पर बैठ गया, तब तो लोगों को षड्यंत्र और धूर्तता की ही प्रेरणा मिलेगी । असत्य और कठोरता की ही प्रेरणा मिलेगी । लोग यही सोचेंगे कि मंथरा और कैकेयी ने मिलकर ऐसी योजना बनाई और षड्यंत्र रहा कि भरत सिंहासन पर बैठ गए । अगर मेरे द्वारा समाज में मन्थरा और कैकेयी के उद्देश्य की पूर्ति हो जाय तो समाज स्वस्थ होगा या अस्वस्थ ? आज भी यही दिखाई देता है कि कोई बुरा व्यक्ति सफलता प्राप्त कर लेता है और अच्छे व्यक्ति को लोग असफल होते देखते हैं तो बहुतों के मन में यह बात आती है कि शायद अच्छा होने पर बुरा फल भोगना पड़ता है । तो बुरे व्यक्ति की सफलता तो दूसरे व्यक्ति को भी बुराई की ही प्रेरणा देगी ।
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