Saturday, 2 July 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत की दृष्टि वैद्य की दृष्टि है और मन्थरा उनकी दृष्टि में एक रोगी की भाँति दया की पात्र है । इस पर विचार करके देखिए । मंथरा को निमित्त बनाकर अयोध्या में सन्निपात हो गया । वहाँ का सम्पूर्ण समाज सन्निपात ग्रस्त हो गया । और उसकी चिकित्सा श्रीभरत जैसे संत ने की । यद्यपि कौशल्या अम्बा को लगा कि सबसे योग्य चिकित्सक गुरु वसिष्ठ ही हैं । भई, अपने घर का बेटा अगर डाक्टर या वैद्य हो जाय तो माता-पिता को उस पर विश्वास नहीं होता । रामायण में सबसे बड़े वैद्य तो श्रीभरत ही हैं पर कौशल्या अम्बा तो उन्हें पुत्र की दृष्टि से देख रही थीं । उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि मेरा पुत्र इतना बड़ा वैद्य है । उन्होनें सोचा कि सारा समाज रोगी हो चुका है और इस रोग को दूर करने वाले वैद्य के रूप में हमारे कुल को गुरु वसिष्ठ जैसे संत और सद्गुरु मिले हैं, अतः समाज के रोग की चिकित्सा उनके द्वारा ही होना चाहिए । तब गुरु वसिष्ठ ने वैद्य की भूमिका स्वीकार कर ली और उन्होंने श्रीभरत से कहा कि तुम अयोध्या का राज्य स्वीकार कर लो और चौदह वर्ष तक राज्य चलाओ । राम के लौटने के पश्चात तुम उन्हें राज्य सौंप देना । पर श्रीभरत उनकी इन चिकित्सा पद्धति से सहमत नहीं होते ।
    .....आगे कल ....

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