भगवान राम ने पादुकाएँ देते हुए जब श्रीभरत की ओर देखा और पूछा - मिल गया आधार ? तो श्रीभरत ने तुरन्त कहा - महाराज, मैं आपको लौटाने आया था और समझ गया कि आप मेरे साथ लौट रहे हैं । इन दोनों रूपों में आप ही मेरे साथ चल रहे हैं । जो यह भेद करते हैं कि यहाँ ईश्वर आधा है, यहाँ चौथाई है - कई लोग कहा करते हैं कि मनुष्य में ईश्वर का अंश अधिक और पशुओं में कम है - उनका गणित तो अनोखा ही है । श्रीभरत का गणित क्या है ? ईश्वर जितना पूर्ण श्रीराम में है, उतना उनकी पादुकाओं में भी है । कितनी परिपूर्ण दृष्टि है उनकी । इसी दिव्य परिपूर्ण दृष्टि के कारण उन्हें उन पादुकाओं में श्रीराम और श्रीसीता की प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही है, उन्हें यही अनुभव हो रहा है कि श्रीराम परिपूर्ण रूप से उनके साथ अयोध्या लौट आए हैं । और इसलिए जब वे सिंहासन पर उन्हें बिठाते हैं तो लोगों को आश्चर्य होता है कि जहाँ पर प्रभु को बिठाना चाहिए वहाँ पर पादुकाओं को रख दिया । पर श्रीभरत की भावना क्या है ? श्रीभरत को अगर खड़ाऊँ दिखाई दे रहा हो, तब तो सिंहासन पर नहीं बिठाते, पर जब उन्हें साक्षात भगवान और श्रीसीता ही दिखाई दे रहे हैं तो उन्होंने सिंहासन पर पादुका नहीं, भगवान और श्रीसीताजी को बिठाया है । और उन्हें बिठाकर राजकाज चला रहे हैं । राजा कौन है ? भगवान श्रीराम और श्रीसीताजी । श्रीभरत नित्य प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं और उनसे आज्ञा लेकर राज्य का संचालन करते हैं । पादुकाओं की पूजा करने का तात्पर्य यही है कि वे नित्य भगवान राम से पूछते हैं कि महाराज ! राज्य आपका है, सिंहासन पर आप बैठते हैं, बताइए अयोध्या का राज्य कैसे चलावें ? भरतजी ने, न तो कभी अपने में स्वामित्व की अहंता स्वीकार की और न ही राज्य की ममता ।
Monday, 7 November 2016
Sunday, 6 November 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भगवान श्रीराघवेन्द्र पादुकाएँ देते हुए भरतजी से बोले - भरत ! मिल गया आधार ? श्रीभरत आनन्दविभोर थे ; बोले - हाँ प्रभु ! मिल गया । जिसकी ओर भी दृष्टि पड़ी, सबने कहा - मिल गया । अलग-अलग प्रकार के लोग हैं । कोई नाम-जप करनेवाले, कोई सेवावृत्ति वाले, तो कोई कुल की मर्यादा का पालन करनेवाले - सबको इस प्रतीक से आश्रय मिल गया । क्या आश्रय मिल गया ? भगवान राम की ये दो पादुकाएँ प्रजा के प्राणों की रक्षा करने के लिए मानो दो पहरेदार हैं । और ज्ञानी के लिए ? महाराज जनक तो महान ज्ञानी थे । भगवान राम की दृष्टि उनकी ओर गई ; आपको कैसा लगा ? जनकजी बोले - मुझे तो लग रहा है मानो यह पादुका नहीं, भरतजी के प्रेमरत्न को रखने के लिए स्वर्ण मंजूषा दी गयी है । जो राम-नाम के जप करने वाले थे, उन्हें लगा कि ये रा और म दो अक्षर हैं । माताओं को लगा कि यह 'कुलकपाट' कुल की लज्जा बचाने वाले किवाड़ हैं । जो सेवा करने वाले हैं, उनको लगा - ये सेवाधर्म के दो निर्मल नेत्र हैं । सबको कुछ न कुछ मिला ।
Saturday, 5 November 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
भगवान श्रीराम ने जो पादुकाएँ श्रीभरत को दीं, उसे लाया कौन था ? यह भगवान राम के साथ तो थीं नहीं । वे तो जूते और पादुकाएँ छोड़कर ही आए थे । कैकेयीजी की यह आज्ञा थी । तो यह आई कहाँ से ? यह श्रीभरत ही लाए थे । क्यों लाए थे ? भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए वे सारी सामग्री लाए थे, उसमें छत्र, सिंहासन, चामर, तीर्थों के जल और राजा के चरणों में जो पादुका धारण कराई जाती है, वह पादुका भी श्रीभरत ही लेकर आए थे । जब भरतजी ने कहा कि महाराज ! कोई सहारा दीजिए, तो प्रभु ने मुस्कराकर उन्हीं की लाई हुई पादुकाओं को उठाकर उन्हें दे दिया । मानो भगवान का संकेत यह था कि भरत ! यह जो सहारा मैं तुम्हें दे रहा हूँ, यह तो तुम्हारा ही लाया हुआ है, तुम्हारा ही दिया हुआ है । सन्त आश्रय लेता है या मैं आश्रय देता हूँ । सन्त ईश्वर से कहता है कोई आश्रय दीजिए और ईश्वर कहते हैं - मेरे पास जो भी है सब तो भक्तों का ही दिया हुआ है । अगर मैं कुछ दूँगा, अपनी खड़ाऊँ दूँगा तो वह भी मेरी अपनी नहीं है, वह भी तो तुम्हारी दी हुई है । भक्त जो मुझे भेंट करता है, वह तो मैं उसे देता हूँ ।
Friday, 4 November 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
चित्रकूट यात्रा में श्रीभरत सारी सवारियों के होते हुए भी वे स्वयं पैदल चलते हैं । प्रबन्ध सबके लिए कर दिया, पर स्वयं पैदल चले । किसी ने उनसे पूछ लिया कि पैदल चलने का क्या अर्थ है ? उन्होंने कहा कि जिनके पास साधन की सम्पत्ति है, वे सवारी पर चलें, पर जो बेचारा निःसाधन है, जिसके पास रथ, घोड़ा, हाथी, पालकी आदि नहीं है, वह तो पैदल ही चलेगा । हम तो निःसाधन हैं और निःसाधन इस तरह से कि ज्ञान कोटि के साधक से लेकर जो बिल्कुल साधनहीन हैं, उन सबको हमें ईश्वर के सम्मुख ले जाना है - यही श्रीभरत की विशेषता है । और इसलिए सबको लेकर चित्रकूट पहुँचने पर वे भगवान श्रीराम से कहते हैं - महाराज ! सब निराधार नहीं रह सकते । भगवान ने कहा - भरत ! तुम तो निराधार रह सकते हो । उन्होंने कहा - नहीं महाराज ! मुझे तो आधार अवश्य चाहिए । श्रीभरत कहते हैं - महाराज ! बिना आधार के मन को सन्तोष और शान्ति नहीं मिलेगी । श्रीभरत का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के मन को कोई न कोई आश्रय चाहिए, मन की शान्ति के लिए कोई न कोई उपाय चाहिए । श्रीभरत के शब्दों से प्रभु प्रसन्न हो गए और उन्होंने अपनी पादुकाएँ श्रीभरत को दे दीं और श्रीभरत सबकी भावनाओं को तृप्त करते हुए पादुकाएँ स्वीकार करते हैं और उन्हें अपने मस्तक पर रखते हैं ।
Thursday, 3 November 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
श्रीभरत में सभी भावों की परिपूर्णता है । समस्त लोगों को साथ लेकर चित्रकूट जाने का तात्पर्य भी यही है । जो घोड़े पर बैठकर गये वे योगी थे और जो हाथी पर बैठकर गये वे ज्ञानी । इसे आप भौतिक अर्थों में न लें । इसका अभिप्राय यह है कि घोड़े पर जानेवाला व्यक्ति वह है जो घोड़े की चंचलता पर नियंत्रण स्थापित कर सके । घोड़े की लगाम कस कर पकड़े हुए हो । ईश्वर को पाने की जो साधना योगी की है, वह घोड़े पर सवार उस व्यक्ति की तरह है, जो मन के घोड़े पर बैठा हुआ है और उस पर ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, समाधि का लगाम लगाए कसकर पकड़े हुए ईश्वर की दिशा में चल रहा है । हाथी विचार का प्रतीक है । विचार पर आरूढ़ होकर, विचार का आश्रय लेकर जो चल रहा है, वह ज्ञानी है । जो रथ पर बैठे हैं ; रामायण में रथ को धर्म का प्रतीक माना गया है । जो व्यक्ति विविध प्रकार के सत्कर्म करने वाले हैं, वे धर्म के रथ पर बैठकर ईश्वर की ओर बढ़ रहे हैं । और जो भक्त हैं, वे पालकी पर बैठकर जा रहे हैं । पालकी बड़ी आरामदेह सवारी है । ढोए कोई दूसरा और यात्रा पूरी हो किसी अन्य की । चलना किसी को पड़ता है और यात्रा किसी और की पूरी होती है । श्रीभरत ने इस यात्रा में सबके लिए - जो जिसका अधिकारी है, उसके लिए वैसा ही - प्रबन्ध कर दिया है, क्योंकि उनके पास सब हैं - वे ज्ञानी भी हैं, योगी भी हैं, भक्त भी हैं और धार्मिक भी ।
Wednesday, 2 November 2016
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
निर्गुण और सगुण उपासना का एक मुख्य भेद है । निर्गुण उपासना में आधार की अपेक्षा नहीं है । निरालम्ब भाव से व्यक्ति को ऊपर उठने की प्रेरणा दी जाती है । यह अपने स्थान पर, जो इसके अधिकारी हैं, उनके लिए बड़े महत्व की बात है । निरालम्ब भाव से भी लोग उठ सकते हैं । हनुमानजी जैसे आकाशमार्ग से समुद्र को पार कर रहे हैं, हनुमानजी तो हर तरह से चल सकते हैं, जल पर भी, नभ पर भी, थल पर भी । इसका अभिप्राय यह है कि हनुमानजी तो ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग, कर्ममार्ग - सभी मार्गों से चलने के अभ्यस्त हैं । सर्वत्र उनकी पूर्णता है । निर्गुण-निराकार में कोई अवलम्बन नहीं है । न तो नाम है, न रूप और न गुण । व्यक्ति को बिल्कुल निरालम्ब भाव से अपने को ऊपर उठाना है । लेकिन सगुण-साकार की उपासना में मान्यता यह है कि व्यक्ति जीवन में बिना आधार के नहीं रह सकता । मान लीजिए कोई अधिक आधार लेने लगे तो यह आलोचना की जा सकती है कि बहुत आधार ले रहा है, लेकिन जो सब आधार छोड़ देता है, उसको भी तो आखिर पृथ्वी के आधार पर ही तो खड़ा होना पड़ता है । अगर कोई दूसरे के कन्धे का सहारा न ले, लाठी का सहारा न ले तो कम-से-कम पृथ्वी का सहारा ले लेना ही पड़ता है । कोई आधार तो चाहिए ही । वैसे श्रीभरत में सभी भावों की परिपूर्णता है ।
Tuesday, 1 November 2016
युग तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच ........
एक व्यक्ति के रूप में भगवान की सेवा करना उतना कठिन नहीं है, जितना सारे संसार में भेदों के होते हुए भी सब रूपों में भगवान को देख लेना और सबकी सेवा करना । यह इतना कठिन कार्य है कि इनका निर्वाह केवल दो पात्रों ने किया, या तो हनुमानजी ने या श्रीभरत ने । यह अभेद अनन्यता इन्हीं दोनों में है । इनकी दृष्टि में श्रीराम में ही श्रीराम नहीं हैं, वे तो जिससे मिलते हैं, जिसको देखते हैं, उसी को प्रणाम करते हैं । सर्वत्र उन्हें श्रीराम का ही दर्शन होता है । और इस दर्शन से क्या होता है ? श्रीभरत तो न ममता को स्वीकार करते हैं न अहंता को । भगवान राम कहते हैं - भरत, मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जैसा सुन्दर राज्य तुम चला सकते हो, वैसा कोई दूसरा नहीं चला पाएगा । भगवान की इस बात को श्रीभरत अस्वीकार नहीं करते । गुरु वसिष्ठ और अयोध्यावासी तो यह समझ रहे थे कि भरत भगवान राम से लौटने का हठ करेंगे । पर श्रीभरत ने ऐसा नहीं किया । उन्होंने भगवान से कहा - बिना आधार के मन में न सन्तोष है और न शान्ति । मुझे कुछ आधार दीजिए । वे भगवान श्रीराम से कहते हैं - महाराज ! सब निराधार नहीं रह सकते । भगवान ने कहा - भरत ! तुम तो निराधार रह ही सकते हो । उन्होंने कहा - नहीं महाराज ! मुझे तो आधार अवश्य ही चाहिए । श्रीभरत में दोनों प्रकार की निष्ठा है । वे भगवान को सर्वव्यापी देखकर निर्गुण-निराकार भी स्वीकार करते हैं और दूसरी ओर आधार और प्रतीक को महत्व देकर सगुण-साकार की निष्ठा का भी पालन करते हैं । यह प्रतीक, जिसकी हम मन्दिर में आराधना करते हैं, यह आधार है । इस आधार से हमारे अन्तर्मन को सहायता मिलती है ।
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