Monday, 7 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान राम ने पादुकाएँ देते हुए जब श्रीभरत की ओर देखा और पूछा - मिल गया आधार ? तो श्रीभरत ने तुरन्त कहा - महाराज, मैं आपको लौटाने आया था और समझ गया कि आप मेरे साथ लौट रहे हैं । इन दोनों रूपों में आप ही मेरे साथ चल रहे हैं । जो यह भेद करते हैं कि यहाँ ईश्वर आधा है, यहाँ चौथाई है - कई लोग कहा करते हैं कि मनुष्य में ईश्वर का अंश अधिक और पशुओं में कम है - उनका गणित तो अनोखा ही है । श्रीभरत का गणित क्या है ? ईश्वर जितना पूर्ण श्रीराम में है, उतना उनकी पादुकाओं में भी है । कितनी परिपूर्ण दृष्टि है उनकी । इसी दिव्य परिपूर्ण दृष्टि के कारण उन्हें उन पादुकाओं में श्रीराम और श्रीसीता की प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही है, उन्हें यही अनुभव हो रहा है कि श्रीराम परिपूर्ण रूप से उनके साथ अयोध्या लौट आए हैं । और इसलिए जब वे सिंहासन पर उन्हें बिठाते हैं तो लोगों को आश्चर्य होता है कि जहाँ पर प्रभु को बिठाना चाहिए वहाँ पर पादुकाओं को रख दिया । पर श्रीभरत की भावना क्या है ? श्रीभरत को अगर खड़ाऊँ दिखाई दे रहा हो, तब तो सिंहासन पर नहीं बिठाते, पर जब उन्हें साक्षात भगवान और श्रीसीता ही दिखाई दे रहे हैं तो उन्होंने सिंहासन पर पादुका नहीं, भगवान और श्रीसीताजी को बिठाया है । और उन्हें बिठाकर राजकाज चला रहे हैं । राजा कौन है ? भगवान श्रीराम और श्रीसीताजी । श्रीभरत नित्य प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं और उनसे आज्ञा लेकर राज्य का संचालन करते हैं । पादुकाओं की पूजा करने का तात्पर्य यही है कि वे नित्य भगवान राम से पूछते हैं कि महाराज ! राज्य आपका है, सिंहासन पर आप बैठते हैं, बताइए अयोध्या का राज्य कैसे चलावें ? भरतजी ने, न तो कभी अपने में स्वामित्व की अहंता स्वीकार की और न ही राज्य की ममता ।

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