Tuesday, 1 November 2016

युग तुलसी श्रीरामकिंकर उवाच ........

एक व्यक्ति के रूप में भगवान की सेवा करना उतना कठिन नहीं है, जितना सारे संसार में भेदों के होते हुए भी सब रूपों में भगवान को देख लेना और सबकी सेवा करना । यह इतना कठिन कार्य है कि इनका निर्वाह केवल दो पात्रों ने किया, या तो हनुमानजी ने या श्रीभरत ने । यह अभेद अनन्यता इन्हीं दोनों में है । इनकी दृष्टि में श्रीराम में ही श्रीराम नहीं हैं, वे तो जिससे मिलते हैं, जिसको देखते हैं, उसी को प्रणाम करते हैं । सर्वत्र उन्हें श्रीराम का ही दर्शन होता है । और इस दर्शन से क्या होता है ? श्रीभरत तो न ममता को स्वीकार करते हैं न अहंता को । भगवान राम कहते हैं - भरत, मेरा तो ऐसा विश्वास है कि जैसा सुन्दर राज्य तुम चला सकते हो, वैसा कोई दूसरा नहीं चला पाएगा । भगवान की इस बात को श्रीभरत अस्वीकार नहीं करते । गुरु वसिष्ठ और अयोध्यावासी तो यह समझ रहे थे कि भरत भगवान राम से लौटने का हठ करेंगे । पर श्रीभरत ने ऐसा नहीं किया । उन्होंने भगवान से कहा - बिना आधार के मन में न सन्तोष है और न शान्ति । मुझे कुछ आधार दीजिए । वे भगवान श्रीराम से कहते हैं - महाराज ! सब निराधार नहीं रह सकते । भगवान ने कहा - भरत ! तुम तो निराधार रह ही सकते हो । उन्होंने कहा - नहीं महाराज ! मुझे तो आधार अवश्य ही चाहिए । श्रीभरत में दोनों प्रकार की निष्ठा है । वे भगवान को सर्वव्यापी देखकर निर्गुण-निराकार भी स्वीकार करते हैं और दूसरी ओर आधार और प्रतीक को महत्व देकर सगुण-साकार की निष्ठा का भी पालन करते हैं । यह प्रतीक, जिसकी हम मन्दिर में आराधना करते हैं, यह आधार है । इस आधार से हमारे अन्तर्मन को सहायता मिलती है ।

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