भगवान श्रीराघवेन्द्र पादुकाएँ देते हुए भरतजी से बोले - भरत ! मिल गया आधार ? श्रीभरत आनन्दविभोर थे ; बोले - हाँ प्रभु ! मिल गया । जिसकी ओर भी दृष्टि पड़ी, सबने कहा - मिल गया । अलग-अलग प्रकार के लोग हैं । कोई नाम-जप करनेवाले, कोई सेवावृत्ति वाले, तो कोई कुल की मर्यादा का पालन करनेवाले - सबको इस प्रतीक से आश्रय मिल गया । क्या आश्रय मिल गया ? भगवान राम की ये दो पादुकाएँ प्रजा के प्राणों की रक्षा करने के लिए मानो दो पहरेदार हैं । और ज्ञानी के लिए ? महाराज जनक तो महान ज्ञानी थे । भगवान राम की दृष्टि उनकी ओर गई ; आपको कैसा लगा ? जनकजी बोले - मुझे तो लग रहा है मानो यह पादुका नहीं, भरतजी के प्रेमरत्न को रखने के लिए स्वर्ण मंजूषा दी गयी है । जो राम-नाम के जप करने वाले थे, उन्हें लगा कि ये रा और म दो अक्षर हैं । माताओं को लगा कि यह 'कुलकपाट' कुल की लज्जा बचाने वाले किवाड़ हैं । जो सेवा करने वाले हैं, उनको लगा - ये सेवाधर्म के दो निर्मल नेत्र हैं । सबको कुछ न कुछ मिला ।
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