निर्गुण और सगुण उपासना का एक मुख्य भेद है । निर्गुण उपासना में आधार की अपेक्षा नहीं है । निरालम्ब भाव से व्यक्ति को ऊपर उठने की प्रेरणा दी जाती है । यह अपने स्थान पर, जो इसके अधिकारी हैं, उनके लिए बड़े महत्व की बात है । निरालम्ब भाव से भी लोग उठ सकते हैं । हनुमानजी जैसे आकाशमार्ग से समुद्र को पार कर रहे हैं, हनुमानजी तो हर तरह से चल सकते हैं, जल पर भी, नभ पर भी, थल पर भी । इसका अभिप्राय यह है कि हनुमानजी तो ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग, कर्ममार्ग - सभी मार्गों से चलने के अभ्यस्त हैं । सर्वत्र उनकी पूर्णता है । निर्गुण-निराकार में कोई अवलम्बन नहीं है । न तो नाम है, न रूप और न गुण । व्यक्ति को बिल्कुल निरालम्ब भाव से अपने को ऊपर उठाना है । लेकिन सगुण-साकार की उपासना में मान्यता यह है कि व्यक्ति जीवन में बिना आधार के नहीं रह सकता । मान लीजिए कोई अधिक आधार लेने लगे तो यह आलोचना की जा सकती है कि बहुत आधार ले रहा है, लेकिन जो सब आधार छोड़ देता है, उसको भी तो आखिर पृथ्वी के आधार पर ही तो खड़ा होना पड़ता है । अगर कोई दूसरे के कन्धे का सहारा न ले, लाठी का सहारा न ले तो कम-से-कम पृथ्वी का सहारा ले लेना ही पड़ता है । कोई आधार तो चाहिए ही । वैसे श्रीभरत में सभी भावों की परिपूर्णता है ।
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