चित्रकूट यात्रा में श्रीभरत सारी सवारियों के होते हुए भी वे स्वयं पैदल चलते हैं । प्रबन्ध सबके लिए कर दिया, पर स्वयं पैदल चले । किसी ने उनसे पूछ लिया कि पैदल चलने का क्या अर्थ है ? उन्होंने कहा कि जिनके पास साधन की सम्पत्ति है, वे सवारी पर चलें, पर जो बेचारा निःसाधन है, जिसके पास रथ, घोड़ा, हाथी, पालकी आदि नहीं है, वह तो पैदल ही चलेगा । हम तो निःसाधन हैं और निःसाधन इस तरह से कि ज्ञान कोटि के साधक से लेकर जो बिल्कुल साधनहीन हैं, उन सबको हमें ईश्वर के सम्मुख ले जाना है - यही श्रीभरत की विशेषता है । और इसलिए सबको लेकर चित्रकूट पहुँचने पर वे भगवान श्रीराम से कहते हैं - महाराज ! सब निराधार नहीं रह सकते । भगवान ने कहा - भरत ! तुम तो निराधार रह सकते हो । उन्होंने कहा - नहीं महाराज ! मुझे तो आधार अवश्य चाहिए । श्रीभरत कहते हैं - महाराज ! बिना आधार के मन को सन्तोष और शान्ति नहीं मिलेगी । श्रीभरत का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति के मन को कोई न कोई आश्रय चाहिए, मन की शान्ति के लिए कोई न कोई उपाय चाहिए । श्रीभरत के शब्दों से प्रभु प्रसन्न हो गए और उन्होंने अपनी पादुकाएँ श्रीभरत को दे दीं और श्रीभरत सबकी भावनाओं को तृप्त करते हुए पादुकाएँ स्वीकार करते हैं और उन्हें अपने मस्तक पर रखते हैं ।
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