Thursday, 3 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

श्रीभरत में सभी भावों की परिपूर्णता है । समस्त लोगों को साथ लेकर चित्रकूट जाने का तात्पर्य भी यही है । जो घोड़े पर बैठकर गये वे योगी थे और जो हाथी पर बैठकर गये वे ज्ञानी । इसे आप भौतिक अर्थों में न लें । इसका अभिप्राय यह है कि घोड़े पर जानेवाला व्यक्ति वह है जो घोड़े की चंचलता पर नियंत्रण स्थापित कर सके । घोड़े की लगाम कस कर पकड़े हुए हो । ईश्वर को पाने की जो साधना योगी की है, वह घोड़े पर सवार उस व्यक्ति की तरह है, जो मन के घोड़े पर बैठा हुआ है और उस पर ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, समाधि का लगाम लगाए कसकर पकड़े हुए ईश्वर की दिशा में चल रहा है । हाथी विचार का प्रतीक है । विचार पर आरूढ़ होकर, विचार का आश्रय लेकर जो चल रहा है, वह ज्ञानी है । जो रथ पर बैठे हैं ; रामायण में रथ को धर्म का प्रतीक माना गया है । जो व्यक्ति विविध प्रकार के सत्कर्म करने वाले हैं, वे धर्म के रथ पर बैठकर ईश्वर की ओर बढ़ रहे हैं । और जो भक्त हैं, वे पालकी पर बैठकर जा रहे हैं । पालकी बड़ी आरामदेह सवारी है । ढोए कोई दूसरा और यात्रा पूरी हो किसी अन्य की । चलना किसी को पड़ता है और यात्रा किसी और की पूरी होती है । श्रीभरत ने इस यात्रा में सबके लिए - जो जिसका अधिकारी है, उसके लिए वैसा ही - प्रबन्ध कर दिया है, क्योंकि उनके पास सब हैं - वे ज्ञानी भी हैं, योगी भी हैं, भक्त भी हैं और धार्मिक भी ।

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