Saturday, 5 November 2016

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........

भगवान श्रीराम ने जो पादुकाएँ श्रीभरत को दीं, उसे लाया कौन था ? यह भगवान राम के साथ तो थीं नहीं । वे तो जूते और पादुकाएँ छोड़कर ही आए थे । कैकेयीजी की यह आज्ञा थी । तो यह आई कहाँ से ? यह श्रीभरत ही लाए थे । क्यों लाए थे ? भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए वे सारी सामग्री लाए थे, उसमें छत्र, सिंहासन, चामर, तीर्थों के जल और राजा के चरणों में जो पादुका धारण कराई जाती है, वह पादुका भी श्रीभरत ही लेकर आए थे । जब भरतजी ने कहा कि महाराज ! कोई सहारा दीजिए, तो प्रभु ने मुस्कराकर उन्हीं की लाई हुई पादुकाओं को उठाकर उन्हें दे दिया । मानो भगवान का संकेत यह था कि भरत ! यह जो सहारा मैं तुम्हें दे रहा हूँ, यह तो तुम्हारा ही लाया हुआ है, तुम्हारा ही दिया हुआ है । सन्त आश्रय लेता है या मैं आश्रय देता हूँ । सन्त ईश्वर से कहता है कोई आश्रय दीजिए और ईश्वर कहते हैं - मेरे पास जो भी है सब तो भक्तों का ही दिया हुआ है । अगर मैं कुछ दूँगा, अपनी खड़ाऊँ दूँगा तो वह भी मेरी अपनी नहीं है, वह भी तो तुम्हारी दी हुई है । भक्त जो मुझे भेंट करता है, वह तो मैं उसे देता हूँ ।

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