जो प्रारब्धवादी हैं वे यह मानकर चलते हैं कि जब प्रारब्ध से लाभ हुआ था तो प्रारब्ध से ही हानि हो गयी । पर जो भक्त हैं वे मानते हैं कि भगवान ने कृपा करके विजय दिला दी पर कहीं सफलता का अभिमान न हो जाय, कहीं नजर न लगे, इसलिए थोड़ी सी असफलता दे दी । भक्तों के जीवन में यही दिव्य भावना होती है । भक्त जीवन में जो हारते हुए दिखायी देते हैं उस दुख और पराजय में भी वे भगवान के द्वारा अपनी रक्षा ही देखते हैं । लेकिन सही अर्थों में जय और पराजय को लेकर पाना, सफलता तथा विफलता को ले पाना, इससे बहुत कम लोग परिचित हैं ।
Saturday, 7 January 2017
Friday, 6 January 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ........
एक किसी ने भगवान से पूछ दिया - महाराज ! आपने नारद के चरित्र में कलंक क्यों लगवा दिया ? नारद जैसे महात्मा, जिन्होंने काम, क्रोध तथा लोभ तीनों को जीत लिया, पर बीच में आपने यह किस (विश्वमोहिनी प्रसंग) चक्कर में डाल दिया ? भगवान बोले - बात यह है कि अगर बच्चा बहुत सुन्दर हो, तो माँ को बड़ी चिन्ता होती है कि इसको कहीं नजर न लग जाय और नजर से बचाने के लिए माँ एक काला टीका अवश्य ही लगा देती है । इसी प्रकार मैंने भी देखा कि नारद ने काम, क्रोध और लोभ को जीत लिया है, अब बस इसको नजर लगने ही वाली है । भगवान ने कहा कि नारद को एक तो काम की दृष्टि लग गयी, पर उससे भी बड़ा संकट तब पैदा हो गया जब उन्हें अपनी नजर लगने लगी । जब नारद ने काम, क्रोध तथा लोभ को हरा दिया तो काम ने आकर चरणों में प्रणाम किया पर जाते-जाते वह नजर लगाता गया । काम ने कहा - महाराज ! आज तक बड़े-बड़े महात्मा उत्पन्न हुए पर आप जैसा कोई नहीं हुआ । किन्तु उसके बाद सबसे बड़ी बात यह हुई कि काम का वाक्य सुनकर नारद जी अपने आप को देखकर सोचने लगे कि सचमुच मुझमें इतने अधिक गुण हैं । और तब भगवान ने काला टीका लगा दिया । उन्हें लगा कि नारद के मन में अभिमान उत्पन्न हो गया कि मैं इतना चरित्रवान हूँ । मैं काम, क्रोध और लोभ आदि का विजेता हूँ । भगवान ने कहा - नारद तो मेरा नन्हा बालक है । और जैसे बालक को नजर लग जाय तो वह रुग्ण हो जाता है तथा माँ उसकी रुग्णता को दूर करने की चेष्टा करती है, इसी प्रकार नारद को बचाने के लिए मैंने यह खेल किया । वस्तुतः विश्वमोहिनी के प्रति नारद के मन में जो आकर्षण उत्पन्न हुआ, उसके द्वारा मैंने नारद का अभिमान शिथिल कर दिया । बस, यही काला टीका है ।
Thursday, 5 January 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं - लाभालाभौ जयाजयौ - व्यक्ति को लाभ-हानि तथा जय-पराजय में सम रहना चाहिए । पढ़कर आश्चर्य होता है कि भगवान को यह शब्द कहने की क्या आवश्यकता थी ? परन्तु भगवान का अभिप्राय है कि लाभ के साथ हानि तथा जय के साथ पराजय भी जुड़ी हुई है । किन्तु ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति का कर्तव्य यह है कि उसे जय और पराजय दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है । जब जय हो उसका स्वागत तो करे पर अभिमानी बनने से बचे । जय का सदुपयोग तो यह है कि व्यक्ति उसे भगवान के चरणों में अर्पित कर दे, और कहे कि प्रभु यह मेरी जय नहीं है, यह तो आपकी कृपा से मिली है । जीव जो सफलता प्राप्त करता है वह आपकी कृपा से ही पाता है । इस प्रकार व्यक्ति यदि सफलता को ईश्वर से प्राप्त मान लेगा, तो वह अभिमान से बच जायेगा । और अगर पराजय या दुख मिले तो मनुष्य के मन में यह बात आनी चाहिए कि जिसने इतने दिनों तक जय प्रदान की, अगर आज एक पराजय भी उसने दे दी तो उसकी अनुकम्पा ही मानकर हमें स्वीकार करना चाहिए ।
Wednesday, 4 January 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
राजा प्रतापभानु महत्वकांक्षी था, और इतना अधिक महत्वाकांक्षी था कि सारे संसार को जीत लेने के बाद भी उसकी तृप्ति नहीं हुई, संतोष नहीं हुआ और अन्त में वह विन्ध्याचल के गम्भीर वन में गया । आगे चलकर वर्णन आता है कि उसने मृगों पर अपने बाण का प्रहार करते हुए लक्ष्य पर सफलता प्राप्त की । सफलता प्राप्ति के पश्चात सायंकाल को जब वह लौट रहा था तो अचानक उसके सामने एक शूकर आ गया । और वह शूकर बड़ा विशाल था, उसके दाँत बड़े चमकीले थे । उस दृश्य को जब प्रतापभानु ने देखा तो उसके मन में यही आया कि दिन भर तो मैंने शिकार खेला पर इतना बढ़िया शूकर तो कहीं भी नहीं दिखा, चलो इसको भी मारना चाहिए । इतना सोचकर उसने धनुष पर बाण चढ़ाकर शूकर पर चला दिया । महत्वकांक्षी व्यक्ति की यही मनोवृत्ति होती है, क्योंकि उसे संतोष नहीं होता । उसे लगता है कि एक बार और लक्ष्य को जीत लें । किन्तु प्रतापभानु के जीवन में आज पहली बार एक नया अनुभव हुआ । और भी ! प्रतापभानु के जीवन में जो अनुभव हुआ, वह हमारे-आपके सबके जीवन का अनुभव है । कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके लिए कहा जाता है कि वे बड़े सफल हैं, पर क्या कोई बड़े से बड़ा सफल व्यक्ति यह दावा कर सकता है कि जीवन में हमें कभी भी विफलता का सामना नहीं करना पड़ेगा । ऐसा दावा तो कोई व्यक्ति नहीं कर सकता । हाँ ! अगर कोई व्यक्ति यह समझने की भूल करे कि हमें केवल सफलता ही मिलेगी, विफलता नहीं मिलेगी तो यह उसकी मिथ्या धारणा ही होगी ।
Tuesday, 3 January 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......
हनुमान जी महाराज को ईर्ष्या के रूप में सिंहिका मिली, तो उन्होंने उसे क्यों मार डाला ? हनुमान जी आकाश मार्ग से जा रहे हैं, ऊपर उठ रहे हैं, तो इसमें सिंहिका की कोई हानि नहीं है । लेकिन सिंहिका ने हनुमान जी को ज्योंही ऊपर आते हुए देखा त्योंही उसने अपने स्वभाव के अनुसार हनुमान जी को ऊपर से नीचे गिराने का निर्णय लिया । तो दूसरे के पतन से जो प्रसन्न हो तथा दूसरे को खाकर जिसके महत्वकांक्षा की पूर्ति हो ऐसी जो ईर्ष्या है वह समाज का कल्याण नहीं कर सकती । क्योंकि वह व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं देती वरन बढ़ते हुए व्यक्ति को गिराने की प्रेरणा देती है ।
Monday, 2 January 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
.....कल से आगे....
पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ । तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति ज्यादा तेज दौड़ कर आगे वाले व्यक्ति से भी आगे बढ़ जावेगा । यह वृत्ति बहुत अच्छी तो नहीं कही जायेगी लेकिन इस मात्सर्य वृत्ति के द्वारा दूसरे से होड़ लगाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न हो तो समाज में बहुत ऊँची स्थिति नहीं होने पर भी यह चलेगी । विद्यार्थी पढ़ते हैं तो आपस में बढ़ने की होड़ रहती है । और इस प्रतिस्पर्धा में बहुतों की उन्नति भी हो जाया करती है । लेकिन इसका दूसरा पक्ष थोड़ा सा भिन्न है । अगर हमने तेज दौड़ करके दूसरे को हरा दिया तब तो यह मात्सर्य की वृत्ति है, पर कुछ व्यक्ति ऐसे स्वभाव के भी होते हैं कि जब उन्हें लगता है कि दौड़ में तो हम इसकी बराबरी नहीं कर सकते तो क्यों न इसकी टाँग पकड़ कर खींच ले, कि अगर हम न दौड़े तो यह भी न दौड़ने पाये । बस यही ईर्ष्या है । तो दोनों दृष्टियों में से एक को बचाइये और एक को मारिये । मात्सर्य रूपी राहु को रहने दीजिए, पर ईर्ष्या रूपी सिंहिका को मार दीजिए ।
पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ । तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति ज्यादा तेज दौड़ कर आगे वाले व्यक्ति से भी आगे बढ़ जावेगा । यह वृत्ति बहुत अच्छी तो नहीं कही जायेगी लेकिन इस मात्सर्य वृत्ति के द्वारा दूसरे से होड़ लगाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न हो तो समाज में बहुत ऊँची स्थिति नहीं होने पर भी यह चलेगी । विद्यार्थी पढ़ते हैं तो आपस में बढ़ने की होड़ रहती है । और इस प्रतिस्पर्धा में बहुतों की उन्नति भी हो जाया करती है । लेकिन इसका दूसरा पक्ष थोड़ा सा भिन्न है । अगर हमने तेज दौड़ करके दूसरे को हरा दिया तब तो यह मात्सर्य की वृत्ति है, पर कुछ व्यक्ति ऐसे स्वभाव के भी होते हैं कि जब उन्हें लगता है कि दौड़ में तो हम इसकी बराबरी नहीं कर सकते तो क्यों न इसकी टाँग पकड़ कर खींच ले, कि अगर हम न दौड़े तो यह भी न दौड़ने पाये । बस यही ईर्ष्या है । तो दोनों दृष्टियों में से एक को बचाइये और एक को मारिये । मात्सर्य रूपी राहु को रहने दीजिए, पर ईर्ष्या रूपी सिंहिका को मार दीजिए ।
Sunday, 1 January 2017
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......
मात्सर्य से संबंधित एक बड़ा अनोखा वर्णन हनुमान जी की लंका यात्रा के प्रसंग में आता है । गोस्वामीजी ने हनुमान जी की यात्रा का जो वर्णन किया उस यात्रा में उन्होंने एक राक्षसी का वर्णन किया है जिसका नाम था सिंहिका । उसका परिचय गोस्वामीजी ने 'रामाज्ञा-प्रश्न' में यह कहकर दिया कि सिंहिका जो थी वह राहु की माता थी और यह विचित्र बात है कि राहु की अभी तक नवग्रहों में पूजा होती है । लेकिन हनुमान जी को जब राहु की माता मिली तो उसे उन्होंने छोड़ा नहीं, मार दिया । बेटा, यद्यपि पाप-ग्रह ही माना जाता है, पर इतना होते हुए भी अमर ग्रह है, उनकी पूजा होती है । और उसी की माता मार दी गयी, इसका सांकेतिक सूत्र क्या है ? इस पर आप जरा विचार कीजिए । ये तो ईर्ष्या और मात्सर्य की दो वृत्तियाँ हैं । उनमें एक मात्सर्य तो राहु का स्वभाव है तथा ईर्ष्या जो है वह सिंहिका का स्वभाव है । ईर्ष्या और मात्सर्य की वृत्तियाँ एक-दूसरे के बहुत पास हैं, बिल्कुल मिलती-जुलती हैं । कभी-कभी तो किसी से पूछ दीजिए कि मात्सर्य माने, तो वह उत्तर में वह कह देगा - ईर्ष्या । पर ईर्ष्या और मात्सर्य में थोड़ा अंतर है । मात्सर्य शब्द का अर्थ है कि जैसे दो व्यक्ति चल रहे हैं तो स्वाभाविक है कि एक व्यक्ति की गति तेज हो सकती है और दूसरे की धीमी । इस प्रकार एक व्यक्ति तो तेज चलता हुआ आगे है और दूसरा जो पिछड़ गया है उसे बुरा लग रहा है । उस समय उसके मन में जो क्षोभ उत्पन्न होता है उसी का नाम मात्सर्य है । अब इसकी दो प्रतिक्रियाएं होंगी । एक ईर्ष्या की और दूसरी मात्सर्य की । ईर्ष्या वाली प्रतिक्रिया में मात्सर्य वाली प्रतिक्रिया भिन्न होगी । एक प्रतिक्रिया तो यह होगी कि पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ ।
......आगे कल ....
......आगे कल ....
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