Saturday, 7 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

जो प्रारब्धवादी हैं वे यह मानकर चलते हैं कि जब प्रारब्ध से लाभ हुआ था तो प्रारब्ध से ही हानि हो गयी । पर जो भक्त हैं वे मानते हैं कि भगवान ने कृपा करके विजय दिला दी पर कहीं सफलता का अभिमान न हो जाय, कहीं नजर न लगे, इसलिए थोड़ी सी असफलता दे दी । भक्तों के जीवन में यही दिव्य भावना होती है । भक्त जीवन में जो हारते हुए दिखायी देते हैं उस दुख और पराजय में भी वे भगवान के द्वारा अपनी रक्षा ही देखते हैं । लेकिन सही अर्थों में जय और पराजय को लेकर पाना, सफलता तथा विफलता को ले पाना, इससे बहुत कम लोग परिचित हैं ।

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