Wednesday, 4 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

राजा प्रतापभानु महत्वकांक्षी था, और इतना अधिक महत्वाकांक्षी था कि सारे संसार को जीत लेने के बाद भी उसकी तृप्ति नहीं हुई, संतोष नहीं हुआ और अन्त में वह विन्ध्याचल के गम्भीर वन में गया । आगे चलकर वर्णन आता है कि उसने मृगों पर अपने बाण का प्रहार करते हुए लक्ष्य पर सफलता प्राप्त की । सफलता प्राप्ति के पश्चात सायंकाल को जब वह लौट रहा था तो अचानक उसके सामने एक शूकर आ गया । और वह शूकर बड़ा विशाल था, उसके दाँत बड़े चमकीले थे । उस दृश्य को जब प्रतापभानु ने देखा तो उसके मन में यही आया कि दिन भर तो मैंने शिकार खेला पर इतना बढ़िया शूकर तो कहीं भी नहीं दिखा, चलो इसको भी मारना चाहिए । इतना सोचकर उसने धनुष पर बाण चढ़ाकर शूकर पर चला दिया । महत्वकांक्षी व्यक्ति की यही मनोवृत्ति होती है, क्योंकि उसे संतोष नहीं होता । उसे लगता है कि एक बार और लक्ष्य को जीत लें । किन्तु प्रतापभानु के जीवन में आज पहली बार एक नया अनुभव हुआ । और भी ! प्रतापभानु के जीवन में जो अनुभव हुआ, वह हमारे-आपके सबके जीवन का अनुभव है । कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके लिए कहा जाता है कि वे बड़े सफल हैं, पर क्या कोई बड़े से बड़ा सफल व्यक्ति यह दावा कर सकता है कि जीवन में हमें कभी भी विफलता का सामना नहीं करना पड़ेगा । ऐसा दावा तो कोई व्यक्ति नहीं कर सकता । हाँ ! अगर कोई व्यक्ति यह समझने की भूल करे कि हमें केवल सफलता ही मिलेगी, विफलता नहीं मिलेगी तो यह उसकी मिथ्या धारणा ही होगी ।

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