Sunday, 1 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

मात्सर्य से संबंधित एक बड़ा अनोखा वर्णन हनुमान जी की लंका यात्रा के प्रसंग में आता है । गोस्वामीजी ने हनुमान जी की यात्रा का जो वर्णन किया उस यात्रा में उन्होंने एक राक्षसी का वर्णन किया है जिसका नाम था सिंहिका । उसका परिचय गोस्वामीजी ने 'रामाज्ञा-प्रश्न' में यह कहकर दिया कि सिंहिका जो थी वह राहु की माता थी और यह विचित्र बात है कि राहु की अभी तक नवग्रहों में पूजा होती है । लेकिन हनुमान जी को जब राहु की माता मिली तो उसे उन्होंने छोड़ा नहीं, मार दिया । बेटा, यद्यपि पाप-ग्रह ही माना जाता है, पर इतना होते हुए भी अमर ग्रह है, उनकी पूजा होती है । और उसी की माता मार दी गयी, इसका सांकेतिक सूत्र क्या है ? इस पर आप जरा विचार कीजिए । ये तो ईर्ष्या और मात्सर्य की दो वृत्तियाँ हैं । उनमें एक मात्सर्य तो राहु का स्वभाव है तथा ईर्ष्या जो है वह सिंहिका का स्वभाव है । ईर्ष्या और मात्सर्य की वृत्तियाँ एक-दूसरे के बहुत पास हैं, बिल्कुल मिलती-जुलती हैं । कभी-कभी तो किसी से पूछ दीजिए कि मात्सर्य माने, तो वह उत्तर में वह कह देगा - ईर्ष्या । पर ईर्ष्या और मात्सर्य में थोड़ा अंतर है । मात्सर्य शब्द का अर्थ है कि जैसे दो व्यक्ति चल रहे हैं तो स्वाभाविक है कि एक व्यक्ति की गति तेज हो सकती है और दूसरे की धीमी । इस प्रकार एक व्यक्ति तो तेज चलता हुआ आगे है और दूसरा जो पिछड़ गया है उसे बुरा लग रहा है । उस समय उसके मन में जो क्षोभ उत्पन्न होता है उसी का नाम मात्सर्य है । अब इसकी दो प्रतिक्रियाएं होंगी । एक ईर्ष्या की और दूसरी मात्सर्य की । ईर्ष्या वाली प्रतिक्रिया में मात्सर्य वाली प्रतिक्रिया भिन्न होगी । एक प्रतिक्रिया तो यह होगी कि पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ ।
     ......आगे कल ....

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