Thursday, 5 January 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं - लाभालाभौ जयाजयौ - व्यक्ति को लाभ-हानि तथा जय-पराजय में सम रहना चाहिए । पढ़कर आश्चर्य होता है कि भगवान को यह शब्द कहने की क्या आवश्यकता थी ? परन्तु भगवान का अभिप्राय है कि लाभ के साथ हानि तथा जय के साथ पराजय भी जुड़ी हुई है । किन्तु ऐसी परिस्थिति में व्यक्ति का कर्तव्य यह है कि उसे जय और पराजय दोनों से सावधान रहने की आवश्यकता है । जब जय हो उसका स्वागत तो करे पर अभिमानी बनने से बचे । जय का सदुपयोग तो यह है कि व्यक्ति उसे भगवान के चरणों में अर्पित कर दे, और कहे कि प्रभु यह मेरी जय नहीं है, यह तो आपकी कृपा से मिली है । जीव जो सफलता प्राप्त करता है वह आपकी कृपा से ही पाता है । इस प्रकार व्यक्ति यदि सफलता को ईश्वर से प्राप्त मान लेगा, तो वह अभिमान से बच जायेगा । और अगर पराजय या दुख मिले तो मनुष्य के मन में यह बात आनी चाहिए कि जिसने इतने दिनों तक जय प्रदान की, अगर आज एक पराजय भी उसने दे दी तो उसकी अनुकम्पा ही मानकर हमें स्वीकार करना चाहिए ।

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