.....कल से आगे....
पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ । तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति ज्यादा तेज दौड़ कर आगे वाले व्यक्ति से भी आगे बढ़ जावेगा । यह वृत्ति बहुत अच्छी तो नहीं कही जायेगी लेकिन इस मात्सर्य वृत्ति के द्वारा दूसरे से होड़ लगाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न हो तो समाज में बहुत ऊँची स्थिति नहीं होने पर भी यह चलेगी । विद्यार्थी पढ़ते हैं तो आपस में बढ़ने की होड़ रहती है । और इस प्रतिस्पर्धा में बहुतों की उन्नति भी हो जाया करती है । लेकिन इसका दूसरा पक्ष थोड़ा सा भिन्न है । अगर हमने तेज दौड़ करके दूसरे को हरा दिया तब तो यह मात्सर्य की वृत्ति है, पर कुछ व्यक्ति ऐसे स्वभाव के भी होते हैं कि जब उन्हें लगता है कि दौड़ में तो हम इसकी बराबरी नहीं कर सकते तो क्यों न इसकी टाँग पकड़ कर खींच ले, कि अगर हम न दौड़े तो यह भी न दौड़ने पाये । बस यही ईर्ष्या है । तो दोनों दृष्टियों में से एक को बचाइये और एक को मारिये । मात्सर्य रूपी राहु को रहने दीजिए, पर ईर्ष्या रूपी सिंहिका को मार दीजिए ।
पिछड़ने वाला व्यक्ति यह सोचे कि अगर यह तेज दौड़ रहा है तो हम इससे भी तेज दौड़ कर आगे निकल जायँ । तो स्वाभाविक रूप से वह व्यक्ति ज्यादा तेज दौड़ कर आगे वाले व्यक्ति से भी आगे बढ़ जावेगा । यह वृत्ति बहुत अच्छी तो नहीं कही जायेगी लेकिन इस मात्सर्य वृत्ति के द्वारा दूसरे से होड़ लगाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा उत्पन्न हो तो समाज में बहुत ऊँची स्थिति नहीं होने पर भी यह चलेगी । विद्यार्थी पढ़ते हैं तो आपस में बढ़ने की होड़ रहती है । और इस प्रतिस्पर्धा में बहुतों की उन्नति भी हो जाया करती है । लेकिन इसका दूसरा पक्ष थोड़ा सा भिन्न है । अगर हमने तेज दौड़ करके दूसरे को हरा दिया तब तो यह मात्सर्य की वृत्ति है, पर कुछ व्यक्ति ऐसे स्वभाव के भी होते हैं कि जब उन्हें लगता है कि दौड़ में तो हम इसकी बराबरी नहीं कर सकते तो क्यों न इसकी टाँग पकड़ कर खींच ले, कि अगर हम न दौड़े तो यह भी न दौड़ने पाये । बस यही ईर्ष्या है । तो दोनों दृष्टियों में से एक को बचाइये और एक को मारिये । मात्सर्य रूपी राहु को रहने दीजिए, पर ईर्ष्या रूपी सिंहिका को मार दीजिए ।
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