एक किसी ने भगवान से पूछ दिया - महाराज ! आपने नारद के चरित्र में कलंक क्यों लगवा दिया ? नारद जैसे महात्मा, जिन्होंने काम, क्रोध तथा लोभ तीनों को जीत लिया, पर बीच में आपने यह किस (विश्वमोहिनी प्रसंग) चक्कर में डाल दिया ? भगवान बोले - बात यह है कि अगर बच्चा बहुत सुन्दर हो, तो माँ को बड़ी चिन्ता होती है कि इसको कहीं नजर न लग जाय और नजर से बचाने के लिए माँ एक काला टीका अवश्य ही लगा देती है । इसी प्रकार मैंने भी देखा कि नारद ने काम, क्रोध और लोभ को जीत लिया है, अब बस इसको नजर लगने ही वाली है । भगवान ने कहा कि नारद को एक तो काम की दृष्टि लग गयी, पर उससे भी बड़ा संकट तब पैदा हो गया जब उन्हें अपनी नजर लगने लगी । जब नारद ने काम, क्रोध तथा लोभ को हरा दिया तो काम ने आकर चरणों में प्रणाम किया पर जाते-जाते वह नजर लगाता गया । काम ने कहा - महाराज ! आज तक बड़े-बड़े महात्मा उत्पन्न हुए पर आप जैसा कोई नहीं हुआ । किन्तु उसके बाद सबसे बड़ी बात यह हुई कि काम का वाक्य सुनकर नारद जी अपने आप को देखकर सोचने लगे कि सचमुच मुझमें इतने अधिक गुण हैं । और तब भगवान ने काला टीका लगा दिया । उन्हें लगा कि नारद के मन में अभिमान उत्पन्न हो गया कि मैं इतना चरित्रवान हूँ । मैं काम, क्रोध और लोभ आदि का विजेता हूँ । भगवान ने कहा - नारद तो मेरा नन्हा बालक है । और जैसे बालक को नजर लग जाय तो वह रुग्ण हो जाता है तथा माँ उसकी रुग्णता को दूर करने की चेष्टा करती है, इसी प्रकार नारद को बचाने के लिए मैंने यह खेल किया । वस्तुतः विश्वमोहिनी के प्रति नारद के मन में जो आकर्षण उत्पन्न हुआ, उसके द्वारा मैंने नारद का अभिमान शिथिल कर दिया । बस, यही काला टीका है ।
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