Sunday, 7 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान कृष्ण भी शास्त्र को प्रमाण मानते हुए कहते हैं - तस्मन्च्छात्रं प्रमाणन्ते - और भगवान कृष्ण ने जो बात कही, भगवान राम के रूप में इन्होंने चरितार्थ करके दिखाया । क्योंकि भगवान श्रीराघवेन्द्र जब चारों विद्यार्थियों को आगे करके चले तो हम कह सकते हैं कि विद्यार्थियों के रूप में चारों वेद ही भगवान के आगे चल रहे हैं । वेदों के लिए एक वाक्य कहा गया है कि ये वेद जो हैं वे भगवान के निश्वास हैं । और भई ! जब हम और आप चलते हैं तो साँस हमारे आगे-आगे चलती है । और अगर यह प्रश्न किया जा कि भगवान के आगे कौन चलेगा ? तो इसका उत्तर यही दिया जायेगा कि वेद चलेंगे । इसलिए ये चारों विद्यार्थी आगे चलते हैं और भगवान उनके पीछे चलते हैं । पर इन चारों विद्यार्थियों को भगवान राम ने यमुना के किनारे से ही लौटा दिया । लेकिन क्यों लौटा दिये ? आइये, जरा इस पर भी विचार करें । भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि अर्जुन ! वेदों की अतुलित गरिमा होते हुए भी तुम्हें वेदों के ऊपर उठना है । भगवान ने कहा कि अन्त में वेद ज्ञान की भी एक सीमा है इसलिए व्यक्ति को उस वेद ज्ञान से ऊपर उठना चाहिए । इससे वेद की सीमा का कोई हनन नहीं होता ।

Saturday, 6 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान अपने विषय में जो सुनते हैं उसे चाहे शंकर जी बोलें, चाहे ब्रह्मा जी बोलें, चाहे वाल्मीकि जी बोलें, और चाहे कोई अन्य, पर भगवान के लिए न तो उनमें कोई बड़ा है और न ही छोटा । यद्यपि लोग भले ही बहस करें कि इनमें बड़ा कौन है ? इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं कि जब संसार में माता-पिता या श्रेष्ठ व्यक्तियों में इतनी कृपा की भावना होती है कि -
     सुनि सनमानहिं सबहिं सुबानी ।
     भनिति भगति नति गति पहिचानी ।।
      यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ ।
- वे शब्दों पर ध्यान न देकर भाव पर ध्यान देते हैं । तब फिर हमारे प्रभु तो उदारों में भी परम उदार हैं । *जान सिरोमणि कोसलराऊ* हैं । वे तो केवल भाव पर ही ध्यान देते हैं ।

Friday, 5 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी से कहते हैं - ये जितने बड़े महापुरुष हैं, वे जो कुछ वर्णन करते हैं, वह उनकी बुद्धि का विलास है । और भई ! जब सम्पूर्ण का प्रतिपादन किया ही नहीं जा सकता, तो क्या हम उसे बुद्धि का विलास मानकर छोड़ दें ? किन्तु गोस्वामी जी ने कहा - नहीं-नहीं, आप अवश्य ही बुद्धि का विलास कीजिए । व्यक्ति कहता है बुद्धि से, लेकिन भगवान बुद्धि से सुनते नहीं हैं । और यह बढ़िया सूत्र है - अगर बुद्धि से कहा जाय और बुद्धि से सुना जाय तो झगड़ा हुए बिना नहीं रहेगा । क्योंकि बुद्धि का स्वभाव है दूसरे के दोष को निकालना । कई लोग कथा में भी आते हैं, तो गिनते रहते हैं कि प्रवचन में कितनी बार व्याकरण की अशुद्धि हुई ? कौन-सा शब्द बार-बार दोहराया गया ? इसका अभिप्राय है कि बुद्धि से सुनने पर दोष की ओर ध्यान जायेगा ही, क्योंकि बुद्धि का स्वभाव बात को काटना है । बुद्धि का बल तर्क है, तर्क माने कैंची । अतः बुद्धि से सुनने पर व्यक्ति बात तुरन्त काट देता है । इसलिए कितनी भी बढ़िया बात बुद्धि से कही जाय पर बुद्धि से सुना न जाय । भगवान भी हमारी बात बुद्धि से नहीं सुनते हैं । कैसे सुनते हैं - व्यक्ति कहता तो है बुद्धि से पर भगवान सुनते हैं भाव से । भगवान राम भाव ग्राहक हैं । इसलिए वे यह नहीं देखते कि सामने वाला क्या कह रहा है, वरन वे यह देखकर प्रसन्न होते हैं कि मेरे विषय में बेचारा कुछ कहना चाह रहा है । भले ही न कह पा रहा हो पर इसका भाव बढ़िया है ।

Thursday, 4 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ईश्वर के संबंध में जो कुछ कहा जाता है, उसके लिए कोई दावा नहीं कर सकता कि बिल्कुल यही बात सही है । गोस्वामीजी ने कहा भी यही है कि सब जानते हैं कि प्रभु की महिमा असीम है, अनन्त है, पर वह जानते हुए भी सभी लोग कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं । विनय-पत्रिका में भगवान ने पूछा - तुलसीदास ! तुम मेरे संबंध में बहुत ही नये-नये ग्रन्थ लिख रहे हो, तो क्या तुम समझते हो कि मेरी महिमा को अपने ग्रन्थों में ठीक-ठीक लिख दोगे ? गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! बिल्कुल नहीं ! मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि कहने से आपकी महिमा मैं घटाता ही हूँ बढ़ाता नहीं हूँ । क्योंकि सच तो यह है कि महाराज ! कहने पर आपकी महिमा की पूर्णता नहीं हो पाती । भगवान ने कहा - तो फिर कहना क्यों नहीं बन्द कर देते हो ? तो बड़ा सीधा सा उत्तर दे दिया गोस्वामीजी ने कि महाराज ! क्या बतायें, अगर आपके विषय में नहीं कहेंगे, तो संसार के विषय में ही वाणी का प्रयोग करना पड़ेगा । इसलिए भले ही आपकी महिमा असीम हो पर हम अपनी वाणी को धन्य करने के लिए ही उसे कहते हैं, आपकी महिमा को प्रतिपादित करने के लिए नहीं । साधारण व्यक्ति की तो बात ही क्या, बड़े-बड़े मनीषियों के लिए भी जो शब्द लिखा गया, वह भी इसी बात की ओर संकेत करता है ।

Wednesday, 3 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

ईश्वर के सन्दर्भ में यमुनाचार्य जी ने बड़ी मीठी बात कही है । उन्होंने भगवान से कहा कि महाराज ! मैं और ब्रह्मा यदि आपकी स्तुति करने लगें, तो आप पहले मुझ पर प्रसन्न हो जायेंगे, ब्रह्मा पर पर बाद में । भगवान ने पूछा 'ऐसा क्यों' ? तो उन्होंने कहा - प्रभु ! आपके विषय में ब्रह्मा भी कुछ कहेंगे और मैं भी कुछ कहूँगा । पर मेरी बुद्धि तो ससीम है । मेरे मुँह भी एक है । बोलने में थकान जल्दी ही आती है इसलिए आपकी महिमा का वर्णन करते-करते मैं तो जल्दी ही थककर गिर जाऊँगा । और जब आप मुझे गिरा हुआ देखेंगे, तो गोद में उठाये बिना नहीं रहेंगे । किन्तु ब्रह्मा के चार-चार मुँह हैं । बुद्धि भी अधिक और आयु भी अधिक है । इसलिए न तो वे रखेंगे और न ही आप उन्हें उठायेंगे ।

Tuesday, 2 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण के भावार्थ के संबंध में कई बार लोग मुझसे पूछ देते हैं कि तुम जो बात कहते हो, उसको तुलसीदास जी ने भी सोचा था या तुम अपने मन से ही कह देते हो ? तो भई ! मैं इसका सही उत्तर दे सकता हूँ कि अगर रामकिंकर सोच सकता है, तो तुलसीदास जी ने नहीं सोचा होगा, यह कहना तो गोस्वामीजी का बहुत बड़ा अनादर करना होगा । पर गोस्वामीजी के शब्दों में इसका उत्तर सर्वथा भिन्न होगा । तुलसीदास जी कहते हैं कि ईश्वर के सन्दर्भ में चाहे शंकर जी बोलें, चाहे काकभुशुण्डि जी बोलें, चाहे याज्ञवल्क्य जी कहें और चाहे मुझ जैसा तुच्छ व्यक्ति बोले, लेकिन कोई अन्तर नहीं है । और अन्तर इसलिए नहीं है क्योंकि ईश्वर जब असीम है तो उसकी असीमता का प्रतिपादन न तो शंकर जी कर सकते हैं और न ही मैं कर सकता हूँ । क्योंकि असीम तो सीमा में आवेगा नहीं ।

Monday, 1 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

समस्त धर्मग्रंथ ईश्वर की महिमा का वर्णन करते हैं । ईश्वर की भक्ति का उपदेश देते हैं । और सभी ईश्वर की ओर बढ़ने का मार्ग व्यक्ति को बताते हैं । और वे ग्रन्थ जो दावा करते हैं, वे किसी न किसी के लिए समान रूप से उपयोगी हैं । अब यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि इन ग्रन्थों में प्रमुखता किस ग्रन्थ को दी गयी ? और तब गोस्वामीजी अपने अद्भुत शैली के माध्यम से दोनों पक्षों का निर्वाह कर रहे हैं । यदि केवल भौतिक पक्ष का निर्वाह करना होता तो चार विद्यार्थियों को भेजने का तुक समझ में नहीं आता । क्योंकि अगर किसी व्यक्ति को मार्ग दिखाना है, तो आप एक व्यक्ति को भेजेंगे । परन्तु यह चार शब्द बड़ा प्रतीकात्मक है । हमारी मान्यता है कि समस्त ग्रन्थों में परम प्रमाण चारों वेद ही हैं । वेद ही परम प्रामाणिक तथा अपौरुषेय हैं ।