ईश्वर के सन्दर्भ में यमुनाचार्य जी ने बड़ी मीठी बात कही है । उन्होंने भगवान से कहा कि महाराज ! मैं और ब्रह्मा यदि आपकी स्तुति करने लगें, तो आप पहले मुझ पर प्रसन्न हो जायेंगे, ब्रह्मा पर पर बाद में । भगवान ने पूछा 'ऐसा क्यों' ? तो उन्होंने कहा - प्रभु ! आपके विषय में ब्रह्मा भी कुछ कहेंगे और मैं भी कुछ कहूँगा । पर मेरी बुद्धि तो ससीम है । मेरे मुँह भी एक है । बोलने में थकान जल्दी ही आती है इसलिए आपकी महिमा का वर्णन करते-करते मैं तो जल्दी ही थककर गिर जाऊँगा । और जब आप मुझे गिरा हुआ देखेंगे, तो गोद में उठाये बिना नहीं रहेंगे । किन्तु ब्रह्मा के चार-चार मुँह हैं । बुद्धि भी अधिक और आयु भी अधिक है । इसलिए न तो वे रखेंगे और न ही आप उन्हें उठायेंगे ।
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