भगवान अपने विषय में जो सुनते हैं उसे चाहे शंकर जी बोलें, चाहे ब्रह्मा जी बोलें, चाहे वाल्मीकि जी बोलें, और चाहे कोई अन्य, पर भगवान के लिए न तो उनमें कोई बड़ा है और न ही छोटा । यद्यपि लोग भले ही बहस करें कि इनमें बड़ा कौन है ? इसलिए तुलसीदास जी कहते हैं कि जब संसार में माता-पिता या श्रेष्ठ व्यक्तियों में इतनी कृपा की भावना होती है कि -
सुनि सनमानहिं सबहिं सुबानी ।
भनिति भगति नति गति पहिचानी ।।
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ ।
- वे शब्दों पर ध्यान न देकर भाव पर ध्यान देते हैं । तब फिर हमारे प्रभु तो उदारों में भी परम उदार हैं । *जान सिरोमणि कोसलराऊ* हैं । वे तो केवल भाव पर ही ध्यान देते हैं ।
सुनि सनमानहिं सबहिं सुबानी ।
भनिति भगति नति गति पहिचानी ।।
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ ।
- वे शब्दों पर ध्यान न देकर भाव पर ध्यान देते हैं । तब फिर हमारे प्रभु तो उदारों में भी परम उदार हैं । *जान सिरोमणि कोसलराऊ* हैं । वे तो केवल भाव पर ही ध्यान देते हैं ।
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