Thursday, 4 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

ईश्वर के संबंध में जो कुछ कहा जाता है, उसके लिए कोई दावा नहीं कर सकता कि बिल्कुल यही बात सही है । गोस्वामीजी ने कहा भी यही है कि सब जानते हैं कि प्रभु की महिमा असीम है, अनन्त है, पर वह जानते हुए भी सभी लोग कुछ न कुछ कहते ही रहते हैं । विनय-पत्रिका में भगवान ने पूछा - तुलसीदास ! तुम मेरे संबंध में बहुत ही नये-नये ग्रन्थ लिख रहे हो, तो क्या तुम समझते हो कि मेरी महिमा को अपने ग्रन्थों में ठीक-ठीक लिख दोगे ? गोस्वामीजी ने कहा - महाराज ! बिल्कुल नहीं ! मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि कहने से आपकी महिमा मैं घटाता ही हूँ बढ़ाता नहीं हूँ । क्योंकि सच तो यह है कि महाराज ! कहने पर आपकी महिमा की पूर्णता नहीं हो पाती । भगवान ने कहा - तो फिर कहना क्यों नहीं बन्द कर देते हो ? तो बड़ा सीधा सा उत्तर दे दिया गोस्वामीजी ने कि महाराज ! क्या बतायें, अगर आपके विषय में नहीं कहेंगे, तो संसार के विषय में ही वाणी का प्रयोग करना पड़ेगा । इसलिए भले ही आपकी महिमा असीम हो पर हम अपनी वाणी को धन्य करने के लिए ही उसे कहते हैं, आपकी महिमा को प्रतिपादित करने के लिए नहीं । साधारण व्यक्ति की तो बात ही क्या, बड़े-बड़े मनीषियों के लिए भी जो शब्द लिखा गया, वह भी इसी बात की ओर संकेत करता है ।

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