Tuesday, 2 May 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

रामायण के भावार्थ के संबंध में कई बार लोग मुझसे पूछ देते हैं कि तुम जो बात कहते हो, उसको तुलसीदास जी ने भी सोचा था या तुम अपने मन से ही कह देते हो ? तो भई ! मैं इसका सही उत्तर दे सकता हूँ कि अगर रामकिंकर सोच सकता है, तो तुलसीदास जी ने नहीं सोचा होगा, यह कहना तो गोस्वामीजी का बहुत बड़ा अनादर करना होगा । पर गोस्वामीजी के शब्दों में इसका उत्तर सर्वथा भिन्न होगा । तुलसीदास जी कहते हैं कि ईश्वर के सन्दर्भ में चाहे शंकर जी बोलें, चाहे काकभुशुण्डि जी बोलें, चाहे याज्ञवल्क्य जी कहें और चाहे मुझ जैसा तुच्छ व्यक्ति बोले, लेकिन कोई अन्तर नहीं है । और अन्तर इसलिए नहीं है क्योंकि ईश्वर जब असीम है तो उसकी असीमता का प्रतिपादन न तो शंकर जी कर सकते हैं और न ही मैं कर सकता हूँ । क्योंकि असीम तो सीमा में आवेगा नहीं ।

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