काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी से कहते हैं - ये जितने बड़े महापुरुष हैं, वे जो कुछ वर्णन करते हैं, वह उनकी बुद्धि का विलास है । और भई ! जब सम्पूर्ण का प्रतिपादन किया ही नहीं जा सकता, तो क्या हम उसे बुद्धि का विलास मानकर छोड़ दें ? किन्तु गोस्वामी जी ने कहा - नहीं-नहीं, आप अवश्य ही बुद्धि का विलास कीजिए । व्यक्ति कहता है बुद्धि से, लेकिन भगवान बुद्धि से सुनते नहीं हैं । और यह बढ़िया सूत्र है - अगर बुद्धि से कहा जाय और बुद्धि से सुना जाय तो झगड़ा हुए बिना नहीं रहेगा । क्योंकि बुद्धि का स्वभाव है दूसरे के दोष को निकालना । कई लोग कथा में भी आते हैं, तो गिनते रहते हैं कि प्रवचन में कितनी बार व्याकरण की अशुद्धि हुई ? कौन-सा शब्द बार-बार दोहराया गया ? इसका अभिप्राय है कि बुद्धि से सुनने पर दोष की ओर ध्यान जायेगा ही, क्योंकि बुद्धि का स्वभाव बात को काटना है । बुद्धि का बल तर्क है, तर्क माने कैंची । अतः बुद्धि से सुनने पर व्यक्ति बात तुरन्त काट देता है । इसलिए कितनी भी बढ़िया बात बुद्धि से कही जाय पर बुद्धि से सुना न जाय । भगवान भी हमारी बात बुद्धि से नहीं सुनते हैं । कैसे सुनते हैं - व्यक्ति कहता तो है बुद्धि से पर भगवान सुनते हैं भाव से । भगवान राम भाव ग्राहक हैं । इसलिए वे यह नहीं देखते कि सामने वाला क्या कह रहा है, वरन वे यह देखकर प्रसन्न होते हैं कि मेरे विषय में बेचारा कुछ कहना चाह रहा है । भले ही न कह पा रहा हो पर इसका भाव बढ़िया है ।
No comments:
Post a Comment