जब हनुमानजी रावण की सभा में गये तो पहले तो रावण ने उन्हें मृत्यु-दंड देना चाहा, पर बाद में विभीषण के कहने पर रावण ने कहा कि बन्दर की ममता पूँछ पर होती है, इसलिए इसे दुख देने के लिए उसकी ममता को ही जला देना चाहिए । जब पूँछ जल आयेगी तब अपने प्रभु को ले आयेगा और तब मैं देखूँगा कि इसका स्वामी कितना महान है । हनुमानजी ने क्या किया ? उन्होंने अपनी पूँछ बढ़ायी । कितनी बढ़ायी ? लंका के सारे कपड़े और तेल-घी से भी उनकी पूँछ को पूरी तरह लपेटा नहीं जा सका, भिगोया नहीं जा सका । बड़े पते की बात है । ममता जहाँ होगी, वहाँ दो चीजें होंगी, कपड़ा और तेल । यह कपड़ा है 'आवरण' । बस, ममता आयी तो ऐसी पट्टी चढ़ी, ऐसा आवरण चढ़ा कि ममता करने वाले व्यक्ति को फिर कभी सत्य नहीं दिखाई देता । हनुमानजी द्वारा पूँछ को इतना बढ़ा देने का क्या अर्थ है ? यदि ममता ससीम होगी, तो कपड़े में लिपटकर ढँक जायेगी और तेल में डूब जायेगी, लेकिन यदि ममता को ममता के रूप में रखना ही हो, तो उसे ईश्वर से जोड़ देना चाहिए । इसका परिणाम क्या होगा ? व्यक्ति के प्रति ममता सीमित होती है और ईश्वर के प्रति ममता ? ईश्वर असीम है, अतः उसके प्रति ममता भी असीम होगी और ममता यदि असीम हो जाय, तो आवरण इसे ढंकने में समर्थ नहीं है । कोई सांसारिक राग भी इसे भिगोने में समर्थ नहीं है ।
Wednesday, 7 February 2018
Tuesday, 6 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
रामायण में भगवान श्रीराघवेन्द्र ने सिंहासन पर सुग्रीव को बिठाया और अंगद को युवराज बनाया । भगवान कहते हैं कि यही ज्ञान और कर्म का सामंजस्य है । अहंकारी बालि निरहंकारी हो गया और अन्त में भगवान में लीन हो गया । परन्तु अंगद, वे तो अभिमानरहित सत्कर्म के स्वरूप हैं । अंगदजी के चरित्र में पुरूषार्थ तो इतना है कि हनुमानजी के बल के आस-पास यदि किसी का बल दिखाई देता है, तो वह अंगदजी का ही है । इसके बावजूद पूरे रामायण में आपको एक भी ऐसा प्रसंग नहीं मिलेगा, जहाँ अंगद की वाणी में कहीं अभिमान दिखाई दे । उनकी विनम्रता इतनी विलक्षण है कि आदि से अन्त तक निरन्तर वे विजयी बने रहे, पर इस बात का अभिमान उन्हें कभी नहीं हुआ । वे निरन्तर विनम्र ही रहे । भगवान श्रीराम किष्किन्धा में जो राज्य स्थापित करते हैं, उसका स्वरूप यही है कि सुग्रीव और अंगद के बीच सामंजस्य स्थापित हो ।
Monday, 5 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
आप महाभारत में पढ़ते हैं कि भगवान कर्ण से प्रस्ताव करते हैं कि तुम आओ, अपने आपको पहचानो कि तुम कौन हो ? तुम अर्जुन के बड़े भाई हो, युधिष्ठिर के भी बड़े भाई हो, अपने स्वरूप को पहचानो, अपने कर्तव्य को पहचानो, मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि सिंहासन पर तुम बैठोगे, राज्य तुम करोगे और युधिष्ठिर, अर्जुन आदि सभी भाई तुम्हारी सेवा करेंगे । व्यवहार के अर्थ में तो लोग कहेंगे कि यह भगवान की कूटनीति है या छल-कपटपूर्वक कर्ण को दुर्योधन से अलग करने की चेष्टा है, पर आन्तरिक दृष्टि से तो भगवान कर्ण को वही बता रहे हैं, जो जीवन का सत्य है । भगवान का तात्पर्य है कि सूर्य का पुत्र ज्ञान सिंहासन पर बैठे, ज्ञान राज्य करे और धर्म उसकी सेवा करे, राजा युधिष्ठिर नहीं, कर्ण हो । सूर्य से उत्पन्न होने के कारण कर्ण ज्ञान का प्रतीक है और महाराज युधिष्ठिर धर्म के प्रतीक हैं । भगवान की मान्यता यह है कि धर्म भी वन्दनीय है और ज्ञान भी, पर दोनों में ज्ञान अधिक वन्दनीय है । ज्ञान सिंहासन पर बैठे और धर्म उसकी सेवा करे । भगवान इसकी ओर कर्ण का ध्यान आकृष्ट करते हैं, पर कर्ण की समस्या वही है जो बहुत बुद्धिमानों की होती है । कर्ण बोला कि महाराज, अब चाहे जो भी हो, पर मैं दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकूँगा । तो ऐसा ज्ञान किस काम का जो सब जानने-समझने के बाद भी यही कहे कि हम तो मोह के साथ ही रहेंगे, सेवा तो अन्धे के पुत्र की ही करेंगे । तब भगवान यही कहते हैं कि तो फिर मुझे विनाश ही करना पड़ेगा और भगवान ने अन्त में यही किया भी ।
Sunday, 4 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....
रामायण और महाभारत में, या फिर आप गीता के उपदेशों को पढ़ें, चेष्टा सर्वत्र यही की गयी है कि कहीं विचार व्यक्ति को निष्क्रिय न बना दे या कर्म की आसक्ति कहीं व्यक्ति को विचारशून्य न बना दे । महाभारत में अर्जुन के सामने यही समस्या है । अर्जुन जब बहुत विचार करते हैं, उनके मन में जब विचार उमड़ा तो उसका एक परिणाम आया, उनके मन में आया कि हम युद्ध नहीं करेंगे । एक विचारक के रूप में युद्ध के क्या-क्या दुष्परिणाम होंगे, वह अर्जुन के मन में आया और इससे अर्जुन के मन में युद्ध से विरक्ति हो गयी । भगवान अर्जुन को कर्म के लिए प्रेरित करते हैं, पर इस कर्म की विशेषता यही है कि उस कर्म के साथ भगवान विचार को भी जोड़ देते हैं और साथ ही शरणागति का उपदेश देकर कर्म, भक्ति और ज्ञान का सामंजस्य करते हैं । गीता का तत्व भी यही है और मानस में भी इसी ओर संकेत किया गया है ।
Saturday, 3 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
जब मन्थन करेंगे, तो कर्म होगा । जब मन्दराचल को चलाया जाएगा, तो वह विचार का प्रयोग हुआ । अब ईश्वर की आवश्यकता है या नहीं ? बड़ी मधुर बात आयी । प्रश्न उठा, प्रभो, आपने मथानी इतनी बड़ी बना दी, परन्तु मथानी के साथ यह समस्या है कि वह इतनी भारी न हो कि बर्तन ही टूट जाए । यदि आप कहीं मटके में उससे भी अधिक वजन की मथानी डाल दें तो घड़ा ही टूट जाएगा । तो जब इतना बड़ा पहाड़ मन्दराचल समुद्र में डाला जाएगा, तो वह टिकेगा कहाँ ? तो भगवान ने कहा, यह कार्य मुझ पर छोड़ दो । तब भगवान कछुआ बन गये और उस मथानी को अपने पीठ पर ले लिया । कितना सांकेतिक अभिप्राय है । क्या ? यह कि ईश्वर जो हमारे समस्त कर्म और विचार का आधार है, वह प्रत्यक्ष भले न हो, पर अन्तराल में आधार वही है, कर्म और विचार का आधार ईश्वर होना चाहिए । विचार गतियुक्त हो और उसके साथ-साथ प्रयत्न और कर्म भी हो, तो इस प्रक्रिया से अमृतत्व की प्राप्ति होगी ।
Friday, 2 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....
अडिग आस्था से ही श्रद्धा का जन्म होता है । कठिन-से-कठिन और प्रतिकूल समय समय में भी उसमें विकृति नहीं आता और उस अडिग श्रद्धा की सचलता यही है कि वह आन्तरिक रूप से तो श्रद्धा है ही, पर बाह्य रूप से भी वह शिव को पाकर धन्य होना चाहे । श्रद्धा का यही वास्तविक स्वरूप है । भगवान शिव भी यदि गरल (विष) को कंठ में धारण कर सके तो उसी विश्वास के कारण कर सके जो भगवान विष्णु के प्रति अडिग है । इसका सांकेतिक अर्थ यह है कि हमारे जीवन में विचार केवल अडिग आस्था में न रहकर गतियुक्त बने, अचल से सचल बने ।
Thursday, 1 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
विचार जड़ न हो जाए, इसलिए हमारी सारी पौराणिक कथाएँ हमें सावधान करती हैं । पार्वतीजी भगवान शंकर की प्रिया हैं । वे पार्वतीजी किसकी पुत्री हैं ? किसी राजा का नाम लिया जा सकता था, पर नहीं, पुराणों में कहा गया कि वे हिमालय की पुत्री हैं । इसका तात्पर्य क्या हुआ ? पर्वत को, पत्थर को तो संसार में जड़ माना जाता है, पर जब यह कहा गया कि हिमालय से पुत्री का जन्म हुआ तो इसका अभिप्राय यह हुआ कि जड़ता में भी गुण है, उसकी अचलता और अडिगता उसका गुण है । पर ध्यान रखें, यह जड़ताजन्य अडिगता नहीं है, क्योंकि यहाँ पर परम चैतन्यमयी का जन्म हो रहा है, इसलिए इसमें मूल तत्व यही है कि यह हिमालय चैतन्य है । पार्वती मूर्तिमयी श्रद्धा हैं । श्रद्धा का जन्म कब होगा ? जब उसमें अडिग आस्था के साथ चैतन्यता भी हो ।