युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
आप महाभारत में पढ़ते हैं कि भगवान कर्ण से प्रस्ताव करते हैं कि तुम आओ, अपने आपको पहचानो कि तुम कौन हो ? तुम अर्जुन के बड़े भाई हो, युधिष्ठिर के भी बड़े भाई हो, अपने स्वरूप को पहचानो, अपने कर्तव्य को पहचानो, मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि सिंहासन पर तुम बैठोगे, राज्य तुम करोगे और युधिष्ठिर, अर्जुन आदि सभी भाई तुम्हारी सेवा करेंगे । व्यवहार के अर्थ में तो लोग कहेंगे कि यह भगवान की कूटनीति है या छल-कपटपूर्वक कर्ण को दुर्योधन से अलग करने की चेष्टा है, पर आन्तरिक दृष्टि से तो भगवान कर्ण को वही बता रहे हैं, जो जीवन का सत्य है । भगवान का तात्पर्य है कि सूर्य का पुत्र ज्ञान सिंहासन पर बैठे, ज्ञान राज्य करे और धर्म उसकी सेवा करे, राजा युधिष्ठिर नहीं, कर्ण हो । सूर्य से उत्पन्न होने के कारण कर्ण ज्ञान का प्रतीक है और महाराज युधिष्ठिर धर्म के प्रतीक हैं । भगवान की मान्यता यह है कि धर्म भी वन्दनीय है और ज्ञान भी, पर दोनों में ज्ञान अधिक वन्दनीय है । ज्ञान सिंहासन पर बैठे और धर्म उसकी सेवा करे । भगवान इसकी ओर कर्ण का ध्यान आकृष्ट करते हैं, पर कर्ण की समस्या वही है जो बहुत बुद्धिमानों की होती है । कर्ण बोला कि महाराज, अब चाहे जो भी हो, पर मैं दुर्योधन का साथ नहीं छोड़ सकूँगा । तो ऐसा ज्ञान किस काम का जो सब जानने-समझने के बाद भी यही कहे कि हम तो मोह के साथ ही रहेंगे, सेवा तो अन्धे के पुत्र की ही करेंगे । तब भगवान यही कहते हैं कि तो फिर मुझे विनाश ही करना पड़ेगा और भगवान ने अन्त में यही किया भी ।
Monday, 5 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment