युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
जब मन्थन करेंगे, तो कर्म होगा । जब मन्दराचल को चलाया जाएगा, तो वह विचार का प्रयोग हुआ । अब ईश्वर की आवश्यकता है या नहीं ? बड़ी मधुर बात आयी । प्रश्न उठा, प्रभो, आपने मथानी इतनी बड़ी बना दी, परन्तु मथानी के साथ यह समस्या है कि वह इतनी भारी न हो कि बर्तन ही टूट जाए । यदि आप कहीं मटके में उससे भी अधिक वजन की मथानी डाल दें तो घड़ा ही टूट जाएगा । तो जब इतना बड़ा पहाड़ मन्दराचल समुद्र में डाला जाएगा, तो वह टिकेगा कहाँ ? तो भगवान ने कहा, यह कार्य मुझ पर छोड़ दो । तब भगवान कछुआ बन गये और उस मथानी को अपने पीठ पर ले लिया । कितना सांकेतिक अभिप्राय है । क्या ? यह कि ईश्वर जो हमारे समस्त कर्म और विचार का आधार है, वह प्रत्यक्ष भले न हो, पर अन्तराल में आधार वही है, कर्म और विचार का आधार ईश्वर होना चाहिए । विचार गतियुक्त हो और उसके साथ-साथ प्रयत्न और कर्म भी हो, तो इस प्रक्रिया से अमृतत्व की प्राप्ति होगी ।
Saturday, 3 February 2018
युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच
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