Tuesday, 6 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

रामायण में भगवान श्रीराघवेन्द्र ने सिंहासन पर सुग्रीव को बिठाया और अंगद को युवराज बनाया । भगवान कहते हैं कि यही ज्ञान और कर्म का सामंजस्य है । अहंकारी बालि निरहंकारी हो गया और अन्त में भगवान में लीन हो गया । परन्तु अंगद, वे तो अभिमानरहित सत्कर्म के स्वरूप हैं । अंगदजी के चरित्र में पुरूषार्थ तो इतना है कि हनुमानजी के बल के आस-पास यदि किसी का बल दिखाई देता है, तो वह अंगदजी का ही है । इसके बावजूद पूरे रामायण में आपको एक भी ऐसा प्रसंग नहीं मिलेगा, जहाँ अंगद की वाणी में कहीं अभिमान दिखाई दे । उनकी विनम्रता इतनी विलक्षण है कि आदि से अन्त तक निरन्तर वे विजयी बने रहे, पर इस बात का अभिमान उन्हें कभी नहीं हुआ । वे निरन्तर विनम्र ही रहे । भगवान श्रीराम किष्किन्धा में जो राज्य स्थापित करते हैं, उसका स्वरूप यही है कि सुग्रीव और अंगद के बीच सामंजस्य स्थापित हो ।

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