Sunday, 4 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

रामायण और महाभारत में, या फिर आप गीता के उपदेशों को पढ़ें, चेष्टा सर्वत्र यही की गयी है कि कहीं विचार व्यक्ति को निष्क्रिय न बना दे या कर्म की आसक्ति कहीं व्यक्ति को विचारशून्य न बना दे । महाभारत में अर्जुन के सामने यही समस्या है । अर्जुन जब बहुत विचार करते हैं, उनके मन में जब विचार उमड़ा तो उसका एक परिणाम आया, उनके मन में आया कि हम युद्ध नहीं करेंगे । एक विचारक के रूप में युद्ध के क्या-क्या दुष्परिणाम होंगे, वह अर्जुन के मन में आया और इससे अर्जुन के मन में युद्ध से विरक्ति हो गयी । भगवान अर्जुन को कर्म के लिए प्रेरित करते हैं, पर इस कर्म की विशेषता यही है कि उस कर्म के साथ भगवान विचार को भी जोड़ देते हैं और साथ ही शरणागति का उपदेश देकर कर्म, भक्ति और ज्ञान का सामंजस्य करते हैं । गीता का तत्व भी यही है और मानस में भी इसी ओर संकेत किया गया है ।

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