विचार जड़ न हो जाए, इसलिए हमारी सारी पौराणिक कथाएँ हमें सावधान करती हैं । पार्वतीजी भगवान शंकर की प्रिया हैं । वे पार्वतीजी किसकी पुत्री हैं ? किसी राजा का नाम लिया जा सकता था, पर नहीं, पुराणों में कहा गया कि वे हिमालय की पुत्री हैं । इसका तात्पर्य क्या हुआ ? पर्वत को, पत्थर को तो संसार में जड़ माना जाता है, पर जब यह कहा गया कि हिमालय से पुत्री का जन्म हुआ तो इसका अभिप्राय यह हुआ कि जड़ता में भी गुण है, उसकी अचलता और अडिगता उसका गुण है । पर ध्यान रखें, यह जड़ताजन्य अडिगता नहीं है, क्योंकि यहाँ पर परम चैतन्यमयी का जन्म हो रहा है, इसलिए इसमें मूल तत्व यही है कि यह हिमालय चैतन्य है । पार्वती मूर्तिमयी श्रद्धा हैं । श्रद्धा का जन्म कब होगा ? जब उसमें अडिग आस्था के साथ चैतन्यता भी हो ।
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