अडिग आस्था से ही श्रद्धा का जन्म होता है । कठिन-से-कठिन और प्रतिकूल समय समय में भी उसमें विकृति नहीं आता और उस अडिग श्रद्धा की सचलता यही है कि वह आन्तरिक रूप से तो श्रद्धा है ही, पर बाह्य रूप से भी वह शिव को पाकर धन्य होना चाहे । श्रद्धा का यही वास्तविक स्वरूप है । भगवान शिव भी यदि गरल (विष) को कंठ में धारण कर सके तो उसी विश्वास के कारण कर सके जो भगवान विष्णु के प्रति अडिग है । इसका सांकेतिक अर्थ यह है कि हमारे जीवन में विचार केवल अडिग आस्था में न रहकर गतियुक्त बने, अचल से सचल बने ।
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