Wednesday, 7 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

जब हनुमानजी रावण की सभा में गये तो पहले तो रावण ने उन्हें मृत्यु-दंड देना चाहा, पर बाद में विभीषण के कहने पर रावण ने कहा कि बन्दर की ममता पूँछ पर होती है, इसलिए इसे दुख देने के लिए उसकी ममता को ही जला देना चाहिए । जब पूँछ जल आयेगी तब अपने प्रभु को ले आयेगा और तब मैं देखूँगा कि इसका स्वामी कितना महान है । हनुमानजी ने क्या किया ? उन्होंने अपनी पूँछ बढ़ायी । कितनी बढ़ायी ? लंका के सारे कपड़े और तेल-घी से भी उनकी पूँछ को पूरी तरह लपेटा नहीं जा सका, भिगोया नहीं जा सका । बड़े पते की बात है । ममता जहाँ होगी, वहाँ दो चीजें होंगी, कपड़ा और तेल । यह कपड़ा है 'आवरण' । बस, ममता आयी तो ऐसी पट्टी चढ़ी, ऐसा आवरण चढ़ा कि ममता करने वाले व्यक्ति को फिर कभी सत्य नहीं दिखाई देता । हनुमानजी द्वारा पूँछ को इतना बढ़ा देने का क्या अर्थ है ? यदि ममता ससीम होगी, तो कपड़े में लिपटकर ढँक जायेगी और तेल में डूब जायेगी, लेकिन यदि ममता को ममता के रूप में रखना ही हो, तो उसे ईश्वर से जोड़ देना चाहिए । इसका परिणाम क्या होगा ? व्यक्ति के प्रति ममता सीमित होती है और ईश्वर के प्रति ममता ? ईश्वर असीम है, अतः उसके प्रति ममता भी असीम होगी और ममता यदि असीम हो जाय, तो आवरण इसे ढंकने में समर्थ नहीं है । कोई सांसारिक राग भी इसे भिगोने में समर्थ नहीं है ।

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