Thursday, 4 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

भगवान की कृपा के बिना उनकी महिमा नहीं जानी जाती । जब तक जानते नहीं, तब तक विश्वास नहीं होता, जब तक विश्वास नहीं होता, तब तक प्रीति नहीं होती और जब तक प्रीति नहीं होती, तब तक भक्ति में दृढ़ता नहीं आती । उत्तरकाण्ड में यह भक्ति के क्रमिक विकास का क्रम है । सुग्रीव के चरित में यही हुआ । भगवान ने सुग्रीव से पूछा कि विश्वास कैसे होगा ? सुग्रीव ने कहा कि परीक्षा देनी होगी । सुग्रीव ने भगवान की परीक्षा ले ली । वहाँ पर दुन्दुभी राक्षस की हड्डियाँ पड़ी हुई थीं और सात ताड़ के वृक्ष लगे हुए थे । सुग्रीव ने कहा कि महाराज ! मैंने सुना है कि इन सातों ताड़ के वृक्षों को जो एक ही बाण से वेध देगा और दुन्दुभी राक्षस की इस हड्डी को अपने पैर के अँगूठे से सौ योजन दूर फेंक देगा, वही बालि को मार सकेगा । प्रभु की यह इतनी उदारता है कि जीव को विश्वास दिलाने के लिए वे कितना विचित्र कार्य करने को प्रस्तुत हो जाते हैं । प्रभु से राक्षस की हड्डी फेंकने का कार्य कराया गया, इससे भी अधिक विडम्बना क्या हो सकती है ? श्री रघुनाथ ने अनायास ही उन्हें ढहा दिया । उनका यह असीम बल देखकर जब सुग्रीव जान गया, तब उसे विश्वास हुआ और विश्वास हुआ तो प्रीति बढ़ी ।

Wednesday, 3 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

साधना का क्रमिक विकास और सीधा छलाँग, ये दोनों क्रम बालि और सुग्रीव के चरित्र में दिखाई देते हैं । सुग्रीव-चरित में साधना का क्रम विकास दिखाई देगा और बालि-चरित में छलांग दिखाई देगी । सुग्रीव के चरित्र में जो साधना का क्रम है, वह आपके सामने प्रत्यक्ष है । सुग्रीव सीधे भगवान के प्रेमी नहीं बन गए, क्रम से बने । उसके जीवन में भगवान को देखकर एक संशय है, जिज्ञासा है कि ये कौन हैं ? उन्हें हनुमानजी जैसे सन्त का आश्रय प्राप्त है । वे हनुमानजी से पूछते हैं, आप बताइए कि ये कौन हैं ? हनुमानजी जैसे सन्त के द्वारा उन्हें भगवान के निकट ला देना, यही साधना का क्रम है । जीव के ह्रदय में ईश्वर के प्रति संशय है, जिज्ञासा है । उस संशय और जिज्ञासा के समाधान के लिए किसी सन्त का आश्रय लेना चाहिए । हनुमानजी सन्त हैं । सन्त की विशेषता यह है कि वे भगवान को हमारे जीवन के निकट ला देते हैं ।

Tuesday, 2 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सेतुबन्ध के माध्यम से साधना के विविध पक्षों को प्रकट किया गया है । अधिकांश बंदर तो पत्थरों के सेतु के द्वारा और जलचरों के पुल से समुद्र को पार करके अपने जीवन के चरम लक्ष्य को पाने में समर्थ हो जाते हैं । पर ऐसा नहीं कि छलाँग लगाने वाले पात्र न हों । गोस्वामीजी कहते हैं कि कुछ बन्दर आकाश से भी छलांग लगाकर जाने लगे । इसका सीधा तात्पर्य यह है कि साधना का क्रमिक विकास ही वह सेतु है और सीधा छलाँग लगाकर जाना क्रम-विकास न होकर, ईश्वर की कृपा द्वारा ही सम्पन्न होता है । भगवान ने बन्दरों से पूछा, पिछली बार तो केवल हनुमान ही छलाँग लगाकर पार गये थे, पर इस बार तो छलाँग लगाने वाले बन्दरों की संख्या काफी अधिक दिखाई दे रही है । यह अन्तर क्यों पड़ा ? बन्दर बोले कि महाराज, इसमें न तो हनुमानजी की विशेषता है न हम लोगों की कमी है, बन्दर तो आकाश उड़ता नहीं । उसे पक्षी की तरह उड़ने की शक्ति नहीं मिली है । बन्दर तो तभी उड़ेगा, जब उसे पंख मिल जाएँगे । जब आपने हनुमानजी का पक्ष ले लिया ; उनसे कहा कि सीताजी के पास जाओ, तो उन्हें आपकी कृपा का पक्ष मिल गया और वे उड़कर पार हो गये । आज आपकी कृपा का वह पक्ष हम लोगों को भी मिला है, तो हम लोग भी छलाँग लगा रहे हैं । ईश्वर जब पक्ष लेकर कृपापक्ष प्रदान करते हैं, तो व्यक्ति में ऐसी क्षमता भी आ जाती है कि वह क्षणभर में ही चरम सत्य का साक्षात्कार कर अभिमान की सीमा को पार कर लेता है ।

Monday, 1 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सेतुबन्ध प्रसंग का सांकेतिक अभिप्राय यह है कि सद्गुणों को जोड़िये और दुर्गुणों को ईश्वर की ओर मोड़िये । हमारे जीवन में राग है । ये राग मानो जलचर हैं । एक उपाय तो यह भी है कि राग को मिटा दिया जाय । यह पद्धति भी ठीक है कि जो लोग राग को मिटा सकते हैं, मिटा दें ; पर जो राग को मिटाने का मार्ग न स्वीकार कर सकें, वे राग को मिटाने के स्थान पर इस राग को ईश्वर की ओर मोड़ दें । इसमें भी बड़ा सुन्दर सांकेतिक क्रम है । यह जो पत्थरों का पुल है, इसे बन्दरों ने बनाया । इसका अभिप्राय यह है कि हम लोगों को तो सद्गुणों को जोड़कर ही पुल बनाना है ; दुर्गुणों को मोड़ना तो हमारे-आपके नहीं, बल्कि भगवान के ही वश की बात है । जब हम पहले अपने सद्गुणों का सदुपयोग कर लें और तब भगवान से कहें कि प्रभो ! दुर्गुणों को अपने सौन्दर्य के द्वारा अपनी ओर आकृष्ट कर लीजिए, क्योंकि यह जीव के प्रयत्न या पुरुषार्थ से नहीं, आपकी कृपा से ही संभव है ।

Sunday, 31 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

सेतुबन्ध में दूसरी ओर जलचरों के साथ समस्या यह है कि ये मनुष्य को खा जानेवाले हैं । जीवन के दुर्गुण-विचार ही ये जलचर हैं । लक्ष्मणजी ने कहा था, प्रभो, आप समुद्र को सुखा दीजिए । यदि समुद्र सूख जाता तो उसके सारे जलचर भी मर जाते, पर समुद्र ने भगवान से कहा कि प्रभो ! इसमें कोई संदेह नहीं कि लक्ष्मणजी जैसे महापुरुष दुर्गुणों को क्षणभर में जलाकर नष्ट कर सकते हैं, परन्तु आप तो सब पर कृपा करने हेतु आये हुए हैं; तो क्या इन दुर्गुणों का भी सदुपयोग नहीं करेंगे ? और सचमुच भगवान इन दुर्गुणों का भी कितना सार्थक उपयोग करते हैं । अन्त में जब भगवान उस सेतुबन्ध पर खड़े हुए, तो समुद्र से निकले हुए जलचर भगवान का सौन्दर्य देखने लगे । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि सद्गुणों को जोड़िये और दुर्गुणों को ईश्वर की ओर मोड़िये । हमारे जीवन में राग है । ये राग मानो जलचर हैं । इन्हें प्रभु की ओर मोड़ देना चाहिए ।

Saturday, 30 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

.....कल का शेष ....
सद्गुणों के संदर्भ में हमारे जीवन में दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की और दूसरी समस्या आती है, न जुड़ पाने की । सद्गुण है तो अभिमान अवश्य दिखाई देता है और फिर एक सद्गुण आता है, तो दूसरा सद्गुण दूर भागता है । ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ? नल-नील को उपाय प्राप्त था कि उनके स्पर्श से पत्थर हल्के हो जाएँगे । सद्गुणों से अभिमान मिटाना हो तो सन्तों की कृपा प्राप्त कीजिए, सन्तों का आर्शीवाद प्राप्त कीजिए । सत्संग में जाएँगे, अभिमान की निन्दा सुनेंगे तो सद्गुणों में जो 'मैं' जुड़ा हुआ है, वह 'मैं' दूर होगा । परन्तु हल्के होने के बाद भी एक गुण दूसरे गुण के समीप कैसे आएँगे, आपस में जुड़ेंगे कैसे ? इसके लिए कहा गया कि सन्तों की कृपा के साथ-साथ, जब तक भगवन्नाम का आश्रय न लिया जाए, तब तक ये जुड़ेंगे नहीं । भगवन्नाम ही सद्गुणों को जोड़ता है । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि यदि हम देहाभिमान के समुद्र को पार करना चाहते हैं, तो सत्संग के साथ-ही-साथ भगवन्नाम का जप करें । इन दोनों के माध्यम से साधना का एक ऐसा सेतु बनेगा, जिसके द्वारा हम देहाभिमान को पार करके भक्तिरूपा सीताजी का साक्षात्कार कर सकते हैं ।

Friday, 29 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सेतुबन्ध में पहले पत्थर का पुल बनाया । यह सद्गुणों के द्वारा बनाया जाने वाला पुल है । यहाँ सद्गुणों के साथ जो समस्या है, वह सेतुबन्ध के सामने भी आई । पत्थर में दृढ़ता तो खूब है, पर वे उतने ही अधिक भारी भी हैं । जल में डालते ही डूब जाते हैं और केवल स्वयं ही नहीं बल्कि अपने साथ बँधने वाले को भी डुबा देते हैं । सद्गुण के साथ दो समस्याएँ थी । एक तो ये हल्के कैसे हों और दूसरी कि ये जुड़ें कैसे ? नल-नील ने छू दिया तो हल्के हो गए, पर जब उन्हें जल में डाला गया तो वे तरंगों के कारण एक-दूसरे से अलग हो गए । अब जब जोड़ने की बात आई तो हनुमानजी आगे आए । वे बोले कि एक पत्थर पर *रा* लिखो और दूसरे पर *म*, बस पत्थर जुड़ जाएँगे । ऐसा ही किया गया, पत्थर जुड़ गए और इस प्रकार निर्मित पुल से होकर बन्दरों ने समुद्र पार किया । सद्गुणों के संदर्भ में इसका अभिप्राय यह है कि हमारे जीवन में सद्गुणों के साथ दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की ।
     ....शेष कल ....