सेतुबन्ध के माध्यम से साधना के विविध पक्षों को प्रकट किया गया है । अधिकांश बंदर तो पत्थरों के सेतु के द्वारा और जलचरों के पुल से समुद्र को पार करके अपने जीवन के चरम लक्ष्य को पाने में समर्थ हो जाते हैं । पर ऐसा नहीं कि छलाँग लगाने वाले पात्र न हों । गोस्वामीजी कहते हैं कि कुछ बन्दर आकाश से भी छलांग लगाकर जाने लगे । इसका सीधा तात्पर्य यह है कि साधना का क्रमिक विकास ही वह सेतु है और सीधा छलाँग लगाकर जाना क्रम-विकास न होकर, ईश्वर की कृपा द्वारा ही सम्पन्न होता है । भगवान ने बन्दरों से पूछा, पिछली बार तो केवल हनुमान ही छलाँग लगाकर पार गये थे, पर इस बार तो छलाँग लगाने वाले बन्दरों की संख्या काफी अधिक दिखाई दे रही है । यह अन्तर क्यों पड़ा ? बन्दर बोले कि महाराज, इसमें न तो हनुमानजी की विशेषता है न हम लोगों की कमी है, बन्दर तो आकाश उड़ता नहीं । उसे पक्षी की तरह उड़ने की शक्ति नहीं मिली है । बन्दर तो तभी उड़ेगा, जब उसे पंख मिल जाएँगे । जब आपने हनुमानजी का पक्ष ले लिया ; उनसे कहा कि सीताजी के पास जाओ, तो उन्हें आपकी कृपा का पक्ष मिल गया और वे उड़कर पार हो गये । आज आपकी कृपा का वह पक्ष हम लोगों को भी मिला है, तो हम लोग भी छलाँग लगा रहे हैं । ईश्वर जब पक्ष लेकर कृपापक्ष प्रदान करते हैं, तो व्यक्ति में ऐसी क्षमता भी आ जाती है कि वह क्षणभर में ही चरम सत्य का साक्षात्कार कर अभिमान की सीमा को पार कर लेता है ।
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