भगवान की कृपा के बिना उनकी महिमा नहीं जानी जाती । जब तक जानते नहीं, तब तक विश्वास नहीं होता, जब तक विश्वास नहीं होता, तब तक प्रीति नहीं होती और जब तक प्रीति नहीं होती, तब तक भक्ति में दृढ़ता नहीं आती । उत्तरकाण्ड में यह भक्ति के क्रमिक विकास का क्रम है । सुग्रीव के चरित में यही हुआ । भगवान ने सुग्रीव से पूछा कि विश्वास कैसे होगा ? सुग्रीव ने कहा कि परीक्षा देनी होगी । सुग्रीव ने भगवान की परीक्षा ले ली । वहाँ पर दुन्दुभी राक्षस की हड्डियाँ पड़ी हुई थीं और सात ताड़ के वृक्ष लगे हुए थे । सुग्रीव ने कहा कि महाराज ! मैंने सुना है कि इन सातों ताड़ के वृक्षों को जो एक ही बाण से वेध देगा और दुन्दुभी राक्षस की इस हड्डी को अपने पैर के अँगूठे से सौ योजन दूर फेंक देगा, वही बालि को मार सकेगा । प्रभु की यह इतनी उदारता है कि जीव को विश्वास दिलाने के लिए वे कितना विचित्र कार्य करने को प्रस्तुत हो जाते हैं । प्रभु से राक्षस की हड्डी फेंकने का कार्य कराया गया, इससे भी अधिक विडम्बना क्या हो सकती है ? श्री रघुनाथ ने अनायास ही उन्हें ढहा दिया । उनका यह असीम बल देखकर जब सुग्रीव जान गया, तब उसे विश्वास हुआ और विश्वास हुआ तो प्रीति बढ़ी ।
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