Saturday, 30 December 2017

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

.....कल का शेष ....
सद्गुणों के संदर्भ में हमारे जीवन में दो समस्याएँ आती हैं, जिनमें एक तो है अभिमान की और दूसरी समस्या आती है, न जुड़ पाने की । सद्गुण है तो अभिमान अवश्य दिखाई देता है और फिर एक सद्गुण आता है, तो दूसरा सद्गुण दूर भागता है । ऐसी स्थिति में उपाय क्या है ? नल-नील को उपाय प्राप्त था कि उनके स्पर्श से पत्थर हल्के हो जाएँगे । सद्गुणों से अभिमान मिटाना हो तो सन्तों की कृपा प्राप्त कीजिए, सन्तों का आर्शीवाद प्राप्त कीजिए । सत्संग में जाएँगे, अभिमान की निन्दा सुनेंगे तो सद्गुणों में जो 'मैं' जुड़ा हुआ है, वह 'मैं' दूर होगा । परन्तु हल्के होने के बाद भी एक गुण दूसरे गुण के समीप कैसे आएँगे, आपस में जुड़ेंगे कैसे ? इसके लिए कहा गया कि सन्तों की कृपा के साथ-साथ, जब तक भगवन्नाम का आश्रय न लिया जाए, तब तक ये जुड़ेंगे नहीं । भगवन्नाम ही सद्गुणों को जोड़ता है । इसका सांकेतिक अभिप्राय यह है कि यदि हम देहाभिमान के समुद्र को पार करना चाहते हैं, तो सत्संग के साथ-ही-साथ भगवन्नाम का जप करें । इन दोनों के माध्यम से साधना का एक ऐसा सेतु बनेगा, जिसके द्वारा हम देहाभिमान को पार करके भक्तिरूपा सीताजी का साक्षात्कार कर सकते हैं ।

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