Monday, 1 January 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

सेतुबन्ध प्रसंग का सांकेतिक अभिप्राय यह है कि सद्गुणों को जोड़िये और दुर्गुणों को ईश्वर की ओर मोड़िये । हमारे जीवन में राग है । ये राग मानो जलचर हैं । एक उपाय तो यह भी है कि राग को मिटा दिया जाय । यह पद्धति भी ठीक है कि जो लोग राग को मिटा सकते हैं, मिटा दें ; पर जो राग को मिटाने का मार्ग न स्वीकार कर सकें, वे राग को मिटाने के स्थान पर इस राग को ईश्वर की ओर मोड़ दें । इसमें भी बड़ा सुन्दर सांकेतिक क्रम है । यह जो पत्थरों का पुल है, इसे बन्दरों ने बनाया । इसका अभिप्राय यह है कि हम लोगों को तो सद्गुणों को जोड़कर ही पुल बनाना है ; दुर्गुणों को मोड़ना तो हमारे-आपके नहीं, बल्कि भगवान के ही वश की बात है । जब हम पहले अपने सद्गुणों का सदुपयोग कर लें और तब भगवान से कहें कि प्रभो ! दुर्गुणों को अपने सौन्दर्य के द्वारा अपनी ओर आकृष्ट कर लीजिए, क्योंकि यह जीव के प्रयत्न या पुरुषार्थ से नहीं, आपकी कृपा से ही संभव है ।

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