Tuesday, 27 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

ईश्वर में अनन्त गुण हैं और महाप्रभु वल्लभाचार्य कहते हैं कि ईश्वर 'अखिल विरुद्ध धर्माश्रय' हैं । एक ही व्यक्ति में परस्पर विरोधी गुण दिखाई नहीं देते, परन्तु ईश्वर में समस्त विरोधी गुण एक साथ दिखाई देते हैं । प्रश्न उठता है कि ईश्वर भयदायक हैं या अभयदायक ? इसका वही उत्तर है । ईश्वर में कृपागुण भी है और न्यायगुण भी । कृपा और न्याय परस्पर एक-दूसरे से भिन्न हैं । जो न्याय करेगा, वह कृपा नहीं करेगा और जो कृपा करेगा, वह न्याय नहीं कर सकेगा, पर ईश्वर बहुत बड़ा न्यायाधीश है और ईश्वर परम कृपालु भी है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि जिसके जीवन में कृपागुण की स्मृति होती है, वह अभय हो जाता है और जिसके जीवन में ईश्वर के न्यायगुण की याद आती है, वह डर के मारे काँपने लगता है ।

Monday, 26 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव विषयों और भोगों को पाकर कुछ समय के लिए विषय-विमूढ़ और भ्रान्त से हो जाते हैं और अंगद ? अंगद और सुग्रीव में जो भिन्नता है, उसे गोस्वामीजी ने बड़े सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । अंगद की भूमिका और सुग्रीव की भूमिका में बड़ा विलक्षण अन्तर है । लक्ष्मणजी जब सुग्रीव को डराने नगर में पहुँचे तो धनुष चढ़ाकर कहा कि मैं सारे नगर को जलाकर नष्ट कर दूँगा, तब अंगद की भूमिका सामने आयी । जब सुग्रीव ने सुना कि लक्ष्मणजी आये हैं, तो वह बेचारा डर के मारे घर में जाकर छुप गया और अंगद ने क्या किया ? उन्होंने तो बिल्कुल उल्टा काम किया, नगर को व्याकुल देखकर बालि के पुत्र अंगद आये । अंगद लक्ष्मणजी के चरणों में प्रणाम करते हैं और लक्ष्मणजी तत्काल उनकी बाँह पकड़कर कहते हैं कि अंगद ! तुम्हारे लिए तो कहीं रंचमात्र भी भय का प्रश्न नहीं है । वस्तुतः यह अंगद और सुग्रीव के चरित्र का जो सूत्र है, उसको हम यों कह सकते हैं कि एक पात्र ऐसा है, जिसे भय की आवश्यकता है और वह भय के द्वारा ही प्रेरित होता है, दूसरे का चरित्र भय से नहीं, बल्कि विवेक और भक्ति की वृत्ति से प्रेरित होता है, उसे भय की आवश्यकता नहीं होती ।

Sunday, 25 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान श्रीराम ने सुग्रीव को आगे बढ़ाने की चेष्टा की । लेकिन सुग्रीव अपनी भोग-परायण वृत्ति के कारण भोगों को पाते ही उसमें इतने डूब गये और स्वयं को ऐसा भुलावा देने की चेष्टा की, अपने भोगों के पक्ष में ऐसा तर्क खोज लिया कि प्रभु ने श्रीसीताजी का पता लगाने के लिए कहा तो है, पर कोई समय थोड़े ही दिया है कि इतने दिनों के भीतर पता लगाना है । यदि प्रभु ने कोई निश्चित अवधि दी होती, यदि कह दिया होता कि इतने दिनों में पता लगाना है, तो दूसरी बात थी, पर ऐसी कोई जल्दी नहीं है । यह सुग्रीव का अपने आपके प्रति एक बहुत बढ़िया धोखा था, जिसका परिणाम सामने आ गया । हनुमानजी और लक्ष्मणजी जब पहुँचे, तो सुग्रीव डर के मारे काँपने लगे और इसी कारण बाद में बड़े सावधान हो गये । जब बन्दरों को कहा कि श्रीसीताजी का पता लगाकर आओ तो साथ ही यह भी कह दिया " पन्द्रह दिनों के भीतर" । यह पन्द्रह दिन क्यों दे रहे हैं ? बोले कि मैं अनुभव से सीख रहा हूँ । प्रभु ने मुझे समय की सीमा नहीं दी, इसलिए भोग में डूब गया । इसीलिए इन लोगों को अब बता दे रहा हूँ कि यह काम दी हुई समय-सीमा के भीतर ही होना चाहिए ।

Saturday, 24 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव का जीवन क्रमशः विकास का जीवन है । वह क्रम इस प्रकार है, पहले वे संसार में थे । फिर संसार के साथ-साथ उनकी भगवान से मित्रता हुई । भगवान ने उनकी कामनाओं को पूरा किया । उसके बाद जैसे विद्यार्थी को क्रमशः ऊँची कक्षाओं में ले जाने की चेष्टा की जाती है, वैसे ही वे उन्हें आगे बढ़ाने की चेष्टा करते हैं । यहाँ भगवान सुग्रीव को यही सूत्र देते हैं । वे कहते हैं कि तुम जीवन में दोनों को साथ लेकर चलने की चेष्टा करो, व्यवहार का भी निर्वाह करो और भक्ति के लिए भी प्रयास करो । भगवान ने बड़ा सुन्दर सूत्र दे दिया । अब यह व्यवहार कोई सतत स्मृति की वस्तु नहीं है, न तो यह सृष्टि सतत है और न व्यवहार का सम्बन्ध ही सतत हो सकता है, परन्तु भगवान और भक्ति से तो सतत सम्बन्ध की अपेक्षा है । दूसरी बात भगवान ने यह कही कि तुम अंगद को साथ लेकर राज-काज चलाओ, पर राज-काज चलाते हुए भी तुम ह्रदय में सदा यही ध्यान रखना कि श्रीसीताजी का पता लगाना है । बाहर से व्यवहार और भीतर से भगवान के प्रति भक्ति, दोनों के सामंजस्य का सूत्र भगवान ने दिया ।

Friday, 23 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
हनुमानजी से भगवान श्रीराम ने कभी किसी व्यावहारिक कार्य के लिए अपेक्षा नहीं रखी । रामराज्य के बाद भगवान ने अयोध्या से सारे बन्दरों को तो विदा किया, पर हनुमानजी को नहीं किया । इसका एक व्यावहारिक पक्ष यह भी है और वह यह कि भगवान श्रीराघवेन्द्र यह मानकर चलते हैं कि अन्य बन्दरों के लिए पारिवारिक जीवन आवश्यक है, पर हनुमानजी व्यावहारिक भूमिकाओं से ऊपर उठ चुके हैं । उनके जीवन में व्यवहार की अपेक्षा नहीं है । इसलिए भगवान राम ने किसी एक वाक्य के द्वारा भी हनुमान को वहाँ से विदा करने का प्रयास नहीं किया ।

Thursday, 22 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
न तो भगवान श्रीराम की राज्य जाने की कोई समस्या थी और न ही तात्विक दृष्टि से सीताजी से उनका वियोग ही हुआ है । परन्तु यदि इसे उस दृष्टि से न देखकर रंगमंच की दृष्टि से देखें तो वियोग हुआ है, पर राघवेन्द्र तो सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं, सीताजी को पाने के लिए उन्हें सुग्रीव के सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं है, पर भगवान यह कहते हैं कि मित्र ! हम दोनों एक-दूसरे की सहायता कर सकते हैं । जीव भी ईश्वर की सहायता कर सकता है और ईश्वर भी जीव की, इसकी भूमिका ईश्वर ने प्रस्तुत की ।

Wednesday, 21 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

प्रभु का बड़ा कौतुक है कि वे जिससे मिलते हैं, उससे उसी की भाषा में, वैसे ही बनकर बातें करने लगते हैं । हनुमानजी से प्रभु ने नाता जोड़ लिया । प्रभु ने उनसे कहा कि भाई ! हम दोनों का नाता तो शाश्वत है । तुमने स्वीकार किया ही है कि मैं ब्रह्म हूँ और संसार जानता है कि तुम ब्रह्मचारी हो, तो ब्रह्म और ब्रह्मचारी का संबंध तो शाश्वत है । भगवान राघवेन्द्र जब हनुमानजी से नाता जोड़ते हैं, तो ब्रह्म और ब्रह्मचारी का नाता जोड़ते हैं, पर सुग्रीव तो ब्रह्मचारी नहीं, उनसे प्रभु ब्रह्म-तत्व की बात नहीं कहते । उनसे भगवान बिल्कुल व्यावहारिक बातें कहते हैं ।