Saturday, 24 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव का जीवन क्रमशः विकास का जीवन है । वह क्रम इस प्रकार है, पहले वे संसार में थे । फिर संसार के साथ-साथ उनकी भगवान से मित्रता हुई । भगवान ने उनकी कामनाओं को पूरा किया । उसके बाद जैसे विद्यार्थी को क्रमशः ऊँची कक्षाओं में ले जाने की चेष्टा की जाती है, वैसे ही वे उन्हें आगे बढ़ाने की चेष्टा करते हैं । यहाँ भगवान सुग्रीव को यही सूत्र देते हैं । वे कहते हैं कि तुम जीवन में दोनों को साथ लेकर चलने की चेष्टा करो, व्यवहार का भी निर्वाह करो और भक्ति के लिए भी प्रयास करो । भगवान ने बड़ा सुन्दर सूत्र दे दिया । अब यह व्यवहार कोई सतत स्मृति की वस्तु नहीं है, न तो यह सृष्टि सतत है और न व्यवहार का सम्बन्ध ही सतत हो सकता है, परन्तु भगवान और भक्ति से तो सतत सम्बन्ध की अपेक्षा है । दूसरी बात भगवान ने यह कही कि तुम अंगद को साथ लेकर राज-काज चलाओ, पर राज-काज चलाते हुए भी तुम ह्रदय में सदा यही ध्यान रखना कि श्रीसीताजी का पता लगाना है । बाहर से व्यवहार और भीतर से भगवान के प्रति भक्ति, दोनों के सामंजस्य का सूत्र भगवान ने दिया ।

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