Saturday, 3 March 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

तुलसीदास जी से पूछा गया कि आप किसको कथा सुना रहे हैं ? वे बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ । तब तो महाराज ! आपका मन बड़ा ऊँचा होगा, जिसको आप प्रभु की कथा सुना रहे हैं ? बोले कि नहीं, मेरे मन का एक ही विशेषण है । क्या ? मेरा मन बड़ा दुष्ट है । शंकरजी ने सुना तो आश्चर्य चकित हो गये । उन्होंने रोक लगा दी थी, दुष्ट को मत सुनाना । उन्होंने सोचा कि मैंनें दुष्टों को सुनाने पर रोक लगायी और इस दुष्ट ने दुष्ट मन को ही श्रोता बनाया, पर गोस्वामीजी का अभिप्राय यह है कि महाराज ! आप कैलाश शिखर की ऊँचाई पर रहते हैं, वहाँ तो दुष्ट जा ही नहीं सकेगा । हम जिस मनोभूमि में रहते हैं, वहाँ तो दुष्टता ही दुष्टता है । इस दुष्टता की मनोभूमि में अगर हम दुष्ट मन को कथा से वंचित करेंगे, तब तो फिर यह शिष्ट बन ही नहीं पायेगा, इसलिए कृपा कीजिए, गंगा जब ऊपर से नीचे आयेंगी, तभी तो इन दुष्टों की दुष्टता दूर होगी ।

Friday, 2 March 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

गोस्वामीजी विनयपत्रिका में प्रभु की कृपा का वर्णन करते हैं कि भगवान कितने उदार हैं, क्षमाशील हैं, इसका पूरा वर्णन करते हैं और अन्त में वे सम्बोधित किसे करते हैं, सुना किसे रहे हैं ? रामायण के पहले कथावाचक के यहाँ सबसे कम भीड़ थी या उसके अन्तिम कथावाचक के यहाँ ? रामकथा के प्रथम वक्ता तो शंकरजी हैं, उनके यहाँ तो कथा सुननेवाले के लिए पात्रता की इतनी कठिन कसौटी थी कि स्वयं शंकरजी के गणों को भी वहाँ आकर कथा सुनने का अधिकार नहीं दिया गया । इतनी अधिक मर्यादा जिस कथा की है, वह समझ लें कि कितनी दुर्लभ है । कथा की दुर्लभता का जो स्वरूप है, वह शंकरजी के चरित्र में दिखाई देता है, जहाँ शंकरजी स्वयं एक ही वक्ता और पार्वतीजी एक ही श्रोता हैं । भगवान शंकर प्रथम वक्ता हैं और अन्तिम वक्ता गोस्वामीजी हैं । शंकरजी के यहाँ तो कम-से-कम एक श्रोता दिखाई भी पड़ा, पर गोस्वामीजी के यहाँ कोई श्रोता नहीं है, अकेले बैठे हुए गुनगुना रहे हैं । किसी ने पूछा कि महाराज ! किसे सुना रहे हैं ? गोस्वामीजी ने कहा कि भाई, एक श्रोता तो है । कहाँ है ? वे बोले कि बाहर नहीं भीतर है । बोले कि भाई ! मैं अपने मन को सुना रहा हूँ ।

Thursday, 1 March 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

रामायण में पार्वतीजी ने भगवान शंकर से कहा कि आप ईश्वर के स्वभाव का अधिक वर्णन न किया करें । क्यों ? बोलीं कि महाराज ! ईश्वर का स्वभाव सुनकर तो लोगों को मनमानी करने की ईच्छा होगी । लोग अगर सुन लेंगे कि ईश्वर तो बड़ा उदार है, क्षमाशील है, वे जीव के अपराध कभी देखते ही नहीं, तो वे यही समझेंगे कि फिर तो हमें सब कुछ करने की छूट है । इस पर भगवान शंकर ने कहा कि पार्वती ! भगवान के स्वभाव का वर्णन व्यक्ति को पाप करने की प्रेरणा देने के लिए नहीं है । तो फिर किसलिए है ? शंकरजी ने सूत्र देते हुए कहा कि भगवान के स्वभाव का वर्णन करने पर भी भला कितने लोग उनके स्वभाव को जान पाते हैं ? बिरले ही कोई जान पाते हैं और जो जान लेते हैं, उसकी कसौटी क्या है ? भगवान के स्वभाव को जान लेने पर तो जीव ऐसा कृतज्ञ हो जाता है कि उसे भगवान का भजन छोड़कर कुछ अच्छा ही नहीं लगता ।

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

चाहे हम यह मान लें कि ईश्वर डरानेवाला है, या यह मान लें कि ईश्वर अभय देने वाला है । जब उनकी कृपा पर दृष्टि जाती है, उनके स्वभाव पर दृष्टि जाती है, तो यही लगता है कि ईश्वर तो जीवन को निर्भय बनाने वाले हैं और जब जीव ईश्वर की महिमा और अपनी कमियों पर दृष्टि डालता है, वह डर के मारे काँपने लगता है । ऐसी स्थिति में मुख्य बात यह है कि हमारे अन्तःकरण में अगर भय से सद्भाव आये या अभय से आये, ये दोनों ही वृत्तियाँ उपयोगी हैं ।

Tuesday, 27 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

ईश्वर में अनन्त गुण हैं और महाप्रभु वल्लभाचार्य कहते हैं कि ईश्वर 'अखिल विरुद्ध धर्माश्रय' हैं । एक ही व्यक्ति में परस्पर विरोधी गुण दिखाई नहीं देते, परन्तु ईश्वर में समस्त विरोधी गुण एक साथ दिखाई देते हैं । प्रश्न उठता है कि ईश्वर भयदायक हैं या अभयदायक ? इसका वही उत्तर है । ईश्वर में कृपागुण भी है और न्यायगुण भी । कृपा और न्याय परस्पर एक-दूसरे से भिन्न हैं । जो न्याय करेगा, वह कृपा नहीं करेगा और जो कृपा करेगा, वह न्याय नहीं कर सकेगा, पर ईश्वर बहुत बड़ा न्यायाधीश है और ईश्वर परम कृपालु भी है । इसका सीधा-सा अर्थ यह है कि जिसके जीवन में कृपागुण की स्मृति होती है, वह अभय हो जाता है और जिसके जीवन में ईश्वर के न्यायगुण की याद आती है, वह डर के मारे काँपने लगता है ।

Monday, 26 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव विषयों और भोगों को पाकर कुछ समय के लिए विषय-विमूढ़ और भ्रान्त से हो जाते हैं और अंगद ? अंगद और सुग्रीव में जो भिन्नता है, उसे गोस्वामीजी ने बड़े सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है । अंगद की भूमिका और सुग्रीव की भूमिका में बड़ा विलक्षण अन्तर है । लक्ष्मणजी जब सुग्रीव को डराने नगर में पहुँचे तो धनुष चढ़ाकर कहा कि मैं सारे नगर को जलाकर नष्ट कर दूँगा, तब अंगद की भूमिका सामने आयी । जब सुग्रीव ने सुना कि लक्ष्मणजी आये हैं, तो वह बेचारा डर के मारे घर में जाकर छुप गया और अंगद ने क्या किया ? उन्होंने तो बिल्कुल उल्टा काम किया, नगर को व्याकुल देखकर बालि के पुत्र अंगद आये । अंगद लक्ष्मणजी के चरणों में प्रणाम करते हैं और लक्ष्मणजी तत्काल उनकी बाँह पकड़कर कहते हैं कि अंगद ! तुम्हारे लिए तो कहीं रंचमात्र भी भय का प्रश्न नहीं है । वस्तुतः यह अंगद और सुग्रीव के चरित्र का जो सूत्र है, उसको हम यों कह सकते हैं कि एक पात्र ऐसा है, जिसे भय की आवश्यकता है और वह भय के द्वारा ही प्रेरित होता है, दूसरे का चरित्र भय से नहीं, बल्कि विवेक और भक्ति की वृत्ति से प्रेरित होता है, उसे भय की आवश्यकता नहीं होती ।

Sunday, 25 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

भगवान श्रीराम ने सुग्रीव को आगे बढ़ाने की चेष्टा की । लेकिन सुग्रीव अपनी भोग-परायण वृत्ति के कारण भोगों को पाते ही उसमें इतने डूब गये और स्वयं को ऐसा भुलावा देने की चेष्टा की, अपने भोगों के पक्ष में ऐसा तर्क खोज लिया कि प्रभु ने श्रीसीताजी का पता लगाने के लिए कहा तो है, पर कोई समय थोड़े ही दिया है कि इतने दिनों के भीतर पता लगाना है । यदि प्रभु ने कोई निश्चित अवधि दी होती, यदि कह दिया होता कि इतने दिनों में पता लगाना है, तो दूसरी बात थी, पर ऐसी कोई जल्दी नहीं है । यह सुग्रीव का अपने आपके प्रति एक बहुत बढ़िया धोखा था, जिसका परिणाम सामने आ गया । हनुमानजी और लक्ष्मणजी जब पहुँचे, तो सुग्रीव डर के मारे काँपने लगे और इसी कारण बाद में बड़े सावधान हो गये । जब बन्दरों को कहा कि श्रीसीताजी का पता लगाकर आओ तो साथ ही यह भी कह दिया " पन्द्रह दिनों के भीतर" । यह पन्द्रह दिन क्यों दे रहे हैं ? बोले कि मैं अनुभव से सीख रहा हूँ । प्रभु ने मुझे समय की सीमा नहीं दी, इसलिए भोग में डूब गया । इसीलिए इन लोगों को अब बता दे रहा हूँ कि यह काम दी हुई समय-सीमा के भीतर ही होना चाहिए ।

Saturday, 24 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

सुग्रीव का जीवन क्रमशः विकास का जीवन है । वह क्रम इस प्रकार है, पहले वे संसार में थे । फिर संसार के साथ-साथ उनकी भगवान से मित्रता हुई । भगवान ने उनकी कामनाओं को पूरा किया । उसके बाद जैसे विद्यार्थी को क्रमशः ऊँची कक्षाओं में ले जाने की चेष्टा की जाती है, वैसे ही वे उन्हें आगे बढ़ाने की चेष्टा करते हैं । यहाँ भगवान सुग्रीव को यही सूत्र देते हैं । वे कहते हैं कि तुम जीवन में दोनों को साथ लेकर चलने की चेष्टा करो, व्यवहार का भी निर्वाह करो और भक्ति के लिए भी प्रयास करो । भगवान ने बड़ा सुन्दर सूत्र दे दिया । अब यह व्यवहार कोई सतत स्मृति की वस्तु नहीं है, न तो यह सृष्टि सतत है और न व्यवहार का सम्बन्ध ही सतत हो सकता है, परन्तु भगवान और भक्ति से तो सतत सम्बन्ध की अपेक्षा है । दूसरी बात भगवान ने यह कही कि तुम अंगद को साथ लेकर राज-काज चलाओ, पर राज-काज चलाते हुए भी तुम ह्रदय में सदा यही ध्यान रखना कि श्रीसीताजी का पता लगाना है । बाहर से व्यवहार और भीतर से भगवान के प्रति भक्ति, दोनों के सामंजस्य का सूत्र भगवान ने दिया ।

Friday, 23 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
हनुमानजी से भगवान श्रीराम ने कभी किसी व्यावहारिक कार्य के लिए अपेक्षा नहीं रखी । रामराज्य के बाद भगवान ने अयोध्या से सारे बन्दरों को तो विदा किया, पर हनुमानजी को नहीं किया । इसका एक व्यावहारिक पक्ष यह भी है और वह यह कि भगवान श्रीराघवेन्द्र यह मानकर चलते हैं कि अन्य बन्दरों के लिए पारिवारिक जीवन आवश्यक है, पर हनुमानजी व्यावहारिक भूमिकाओं से ऊपर उठ चुके हैं । उनके जीवन में व्यवहार की अपेक्षा नहीं है । इसलिए भगवान राम ने किसी एक वाक्य के द्वारा भी हनुमान को वहाँ से विदा करने का प्रयास नहीं किया ।

Thursday, 22 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
न तो भगवान श्रीराम की राज्य जाने की कोई समस्या थी और न ही तात्विक दृष्टि से सीताजी से उनका वियोग ही हुआ है । परन्तु यदि इसे उस दृष्टि से न देखकर रंगमंच की दृष्टि से देखें तो वियोग हुआ है, पर राघवेन्द्र तो सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं, सीताजी को पाने के लिए उन्हें सुग्रीव के सहयोग की कोई आवश्यकता नहीं है, पर भगवान यह कहते हैं कि मित्र ! हम दोनों एक-दूसरे की सहायता कर सकते हैं । जीव भी ईश्वर की सहायता कर सकता है और ईश्वर भी जीव की, इसकी भूमिका ईश्वर ने प्रस्तुत की ।

Wednesday, 21 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

प्रभु का बड़ा कौतुक है कि वे जिससे मिलते हैं, उससे उसी की भाषा में, वैसे ही बनकर बातें करने लगते हैं । हनुमानजी से प्रभु ने नाता जोड़ लिया । प्रभु ने उनसे कहा कि भाई ! हम दोनों का नाता तो शाश्वत है । तुमने स्वीकार किया ही है कि मैं ब्रह्म हूँ और संसार जानता है कि तुम ब्रह्मचारी हो, तो ब्रह्म और ब्रह्मचारी का संबंध तो शाश्वत है । भगवान राघवेन्द्र जब हनुमानजी से नाता जोड़ते हैं, तो ब्रह्म और ब्रह्मचारी का नाता जोड़ते हैं, पर सुग्रीव तो ब्रह्मचारी नहीं, उनसे प्रभु ब्रह्म-तत्व की बात नहीं कहते । उनसे भगवान बिल्कुल व्यावहारिक बातें कहते हैं ।

Tuesday, 20 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

हनुमानजी सुग्रीव को भगवान से मिलाते हैं । वहाँ एक बात देखते हैं कि भगवान जब सुग्रीव से वार्तालाप करते हैं और हनुमानजी से जो बातें करते हैं, इन दोनों में बड़ी भिन्नता है । जब हनुमानजी से प्रभु का मिलन हुआ, तब भगवान उन्हें अनन्य भक्ति के स्वरूप का उपदेश देते हैं । प्रभु कहते हैं कि भक्ति तो अनन्य होनी चाहिए और हनुमान ! जो समस्त ब्रह्मांड को मेरा ही रूप मानकर और अपने को सेवक मानकर सबकी सेवा करता है, वही अनन्य भक्ति है और मुझे विश्वास है कि तुम्हारे जीवन में वही अनन्य भक्ति विद्यमान है । प्रभु जब हनुमानजी से बातें करते हैं, तब स्तर यह है, पर जब वे सुग्रीव से मिलते हैं, तब उन्हें भक्ति का उपदेश नहीं देते, ज्ञान-विज्ञान की बातें नहीं करते, वे ऐसी कोई भी आध्यात्मिक या पारमार्थिक बात नहीं करते, जो सामान्य धरातल से ऊपर की हो । बल्कि प्रभु बड़ी व्यावहारिक बातें बताते हुए कहते हैं कि सुग्रीव आज से हम तुम मित्र हो गए, मित्र को चाहिए कि न तो देने में संकोच करे और न लेने में । हनुमानजी से वे लेन-देन की बात नहीं करते, पर सुग्रीव से लेन-देन की बात में भी संकोच नहीं करते । इसका क्या तात्पर्य है ? हनुमानजी तो लेने वाले हैं नहीं ; बस देने वाले हैं, यदि सुग्रीव से भी यह कह दिया जाय कि देना ही भक्ति है, तब तो सुग्रीव भक्ति से बहुत दूर हो जाते ।

Monday, 19 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....
सुग्रीव के जीवन में संकेत आता है कि हनुमानजी के द्वारा सुग्रीव धीरे-धीरे भगवान की दिशा में मोड़े जाते हैं । हनुमानजी के जीवन में यह उदारता का पक्ष है और यह बड़ा व्यावहारिक भी है । इसका अर्थ है कि जैसे आपके परिवार में आपके कई पुत्र हों, कई सदस्य हों, तो क्या आप परिवार के हर सदस्य से एक ही प्रकार की आशा रखते हैं ? एक नन्हा बालक है, जो दो-चार साल का है और एक युवक है, दोनों पुत्र हैं । ऐसी स्थिति में हम एक युवक पुत्र से जो आशा रखते हैं, वह एक नन्हें बालक से नहीं रख सकते । हम यह मानकर चलते हैं कि युवक का कर्तव्य यही है, पर नन्हे बालक को तो कुछ-न-कुछ छूट देनी ही पड़ेगी । ऐसी स्थिति में श्री हनुमानजी के चरित्र में उदारता का पक्ष यही है कि वे स्वयं सुग्रीव की कमियों से परिचित होते हुए भी यह जानते हैं कि सुग्रीव जैसे दुर्बल व्यक्ति को आश्रय की जरूरत है, तिरस्कार की नहीं । यदि उनको घृणा की दृष्टि से देखकर दूर भगा दिया जाय, तब तो ऐसे व्यक्ति के कल्याण का कोई मार्ग रह ही नहीं जायेगा ।

Sunday, 18 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

हनुमानजी स्वयं परम वैराग्यवान होकर भी सुग्रीव जैसे व्यक्ति को सम्मान या महत्व देने में उनको रंचमात्र भी हिचकिचाहट नहीं होती । वे सुग्रीव के पास रहकर निरन्तर प्रसन्न दिखाई देते हैं । यह जो हनुमानजी और सुग्रीव की वृत्ति है, इस दृष्टि से भी बड़ी हितकर है कि भले ही हमारे जीवन में दुर्बलताएँ हों, पर इसके बाद भी यदि हम ऐसे लोगों के पास रहेंगे या उनसे मित्रता जोड़ेंगे, जिनमें बड़ी दुर्बलताएँ विद्यमान हैं, तो इसके स्वाभाविक परिणामस्वरूप उस दुर्बलता को और भी अधिक बढ़ावा मिलेगा । ऐसे व्यक्तियों के संपर्क में हमारी दुर्बलताएँ और भी बढ़ेंगी । परन्तु स्वयं में दुर्बलता होते हुए भी जब हमारी श्रद्धा और आदर का केन्द्र कोई वैराग्यवान महापुरुष होता है, तो मन से भले ही वह व्यक्ति रोगी हो, पर बुद्धि से उसके मन में वैराग्य के प्रति श्रद्धा है ।

Saturday, 17 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

यदि हम हनुमानजी के चरित्र पर दृष्टि डालें तो उनके जीवन में पारिवारिक व्यवहार का कोई चित्र सामने नहीं आता । हनुमानजी बाल-ब्रह्मचारी हैं और सर्वतोभावेन श्रीराम की सेवा में समर्पित हैं । दूसरी ओर सुग्रीव जैसे लोग भी हैं, जिनके जीवन में उपरामता नहीं, बल्कि विषयासक्ति है । ऐसी स्थिति में मानस में यह जो समन्वय की पद्धति है, उसका सर्वश्रेष्ठ परिचय हनुमानजी और सुग्रीव के सम्बन्ध में मिलता है । साधारणतया जो व्यक्ति विषयी होता है, उसकी मित्रता भी विषयी लोगों में होती है और उसी प्रकार जो व्यक्ति विषयों से उपराम अर्थात वैराग्यवान है, उसकी संगति भी वैराग्यवानों से होती है, पर हनुमानजी और सुग्रीव के चरित्र में एक बड़ी विचित्रता है कि सुग्रीव के चरित्र में वैराग्य व उपरामता तो नहीं है, पर उनके विश्वास-पात्र हनुमानजी वैराग्यवान हैं । यह सुग्रीव के चरित्र का एक विचित्र पक्ष है कि विषयी होते हुए भी उनकी श्रद्धा और विश्वास की वृत्ति वैराग्यवान के प्रति है और यही भविष्य में सुग्रीव के कल्याण का कारण बनती है ।

Friday, 16 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच

कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं कि व्यावहारिक जीवन के प्रति उन्हें कोई आकर्षण नहीं होता अर्थात ऐसे व्यक्ति के जीवन में पूर्व-पूर्व जन्मों से वैराग्य या उपरामता का उदय हो गया है । जिनके जीवन में यह वैराग्य व उपरामता की वृत्ति आ गयी है, उनके लिए यह जरूरी नहीं कि जीवन में व्यवहार को स्वीकार करें, पर ऐसे व्यक्ति बहुत विरले होते हैं । अधिकांश लोग ऐसे होते हैं, जिनके संस्कार सांसारिक होते हैं । यहाँ पर यदि तुलना के रूप में देखें तो स्पष्ट रूप से तीन पात्र सामने आते हैं - श्री हनुमानजी, सुग्रीव और अंगद ।

Thursday, 15 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

साधारण दृष्टि से देखने पर तो सभी एक जैसे दिखाई देते हैं, परन्तु मन और अन्तःकरण के संस्कार और उसकी बनावट पर दृष्टि डालें तो देखेंगे कि उसमें भिन्नता है । ऐसी स्थिति में उसका गणित के समान कोई निश्चित नियम नहीं है कि जिसमें यह कहा जा सके कि हर व्यक्ति के जीवन में इसी क्रम को स्वीकार करना चाहिए । अपितु इसका उत्तर यही है कि वस्तुतः अधिकारी भेद से व्यक्ति के अन्तःकरण का जैसा निर्माण हुआ है, उसी के अनुरूप साधना-पद्धति स्वीकार करनी चाहिए ।

Wednesday, 14 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

भगवान राम ने सुग्रीव को यह कहा था कि तुम्हें श्रीसीताजी का पता लगाना है, यह परम आवश्यक कार्य है । यह जो सूत्र श्रीराम ने सुग्रीव को दिया, वह सूत्र तो संसार के हर व्यक्ति के लिए है, क्योंकि हमारे आपके जीवन में इस प्रकार के प्रश्न आते हैं, इस प्रकार की समस्याएँ आती हैं । वह यह है कि एक ओर तो सांसारिक कार्य हैं, व्यावहारिक स्वार्थ के कार्य हैं और दूसरी ओर सत्संग में भक्ति और ज्ञान की महिमा और ईश्वर या भक्ति की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाया जाता है । ऐसी स्थिति में व्यक्ति कभी-कभी स्वयं को बड़ी उलझन में पाता है कि कैसे इन दोनों का क्रम से निर्वाह किया जाए । या तो इसका अर्थ यह लिया जा सकता है कि पहले हम व्यावहारिक जीवन की समस्या को सुलझा लें और उसके बाद परमार्थ की प्राप्ति की चेष्टा करें या दूसरा सूत्र यह है कि व्यावहारिक समस्या में उलझने के बाद तो व्यक्ति परमार्थ की दिशा से विरत हो जाता है, अतः व्यवहार की उपेक्षा करके हमें जीवन के चरम लक्ष्य को पाने की चेष्टा करनी चाहिए । मानस में इसका जो उत्तर दिया गया, वह उत्तर एक रूप में नहीं दिया गया । भिन्न-भिन्न प्रसंगों में इस प्रश्न के भिन्न-भिन्न उत्तर दिये गये हैं । तात्पर्य यह है कि अलग-अलग प्रकार के व्यक्ति के लिए उत्तर भी अलग-अलग हैं ।

Tuesday, 13 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

भगवान राम जब अंगद को अयोध्या से विदा करने लगे, तब उन्होंने प्रार्थना की कि वे उन्हें अयोध्या में ही अपनी सेवा में रख लें । प्रभु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की और बोले कि तुम किष्किन्धा जाओ, अवश्य जाओ, यही उचित है और वहाँ युवराज के रूप में राज्य चलाओ । उस समय अंगद की हिचकिचाहट देखकर भगवान को लगा कि इसकी वह मनोग्रन्थि मिट नहीं रही है कि सुग्रीव मेरे विरोधी हैं और उसे मिटाये बिना इन दोनों को मिलाये बिना समग्रता नहीं आयेगी । अतः भगवान ने अंगद को विदा तो किया, पर उसके पहले उन्होंने अपने गले की माला निकालकर अंगद के गले में पहना दी । इसका क्या अभिप्राय है ? मानो प्रभु ने कहा कि अंगद, घबराओ मत, तुम्हारे मन में यह जो ग्रन्थि है कि सुग्रीव तुम्हें दण्ड देने के लिए मौके की खोज में रहेंगे, पर विश्वास रखो, तुम्हारे गले में यह मेरी माला देखते ही सुग्रीव को सारी बातें याद आ जायेंगी । बालि और सुग्रीव का जब युद्ध हुआ था, तो तुम्हारे पिता को चेतावनी देने के लिए मैंने सुग्रीव को माला पहनाई थी और आज तुम्हें भी पहना रहा हूँ । सुग्रीव से बढ़कर भला इस माला का चमत्कार कौन जानता है ? इसलिए तुम विश्वास रखो, यह एक ऐसा सूत्र है, जिसके आधार पर सुग्रीव कोई भूल नहीं कर सकते । देह के नाते से तुम्हारी दूरी बनी रहेगी, पर मेरे नाते जब जब तुम नाता जोड़ोगे कि तुम मेरे प्रिय भक्त हो और सुग्रीव भी मेरा प्रिय सखा है, इस नाते से तुम्हारा यह चाचा-भतीजे का संस्कार मिटेगा, तुम्हारी आपसी दूरी मिटेगी ।

Monday, 12 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

यदि अंगद को लगता कि बालि मेरे पिता हैं, मैं उनका पुत्र हूँ, मेरा जन्म उनसे हुआ है और मेरे पिता को मारने वाले श्रीराम मेरा शत्रु हैं, तब तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होती, पर वे सचमुच ही देहाभिमान से ऊपर उठे हुए थे, देह की ममता से मुक्त हो चुके थे । उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ रावण से कहा कि मैं समझ गया, तुम बड़े राजनीतिज्ञ की तरह मुझे राम से अलग करना चाहते हो, लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि राम को मैंने एक व्यक्ति की तरह कभी नहीं देखा - श्रीराम कोई व्यक्ति नहीं हैं । वे तो अन्तरात्मा के रूप में सभी प्राणियों के अन्तर में निवास करते हैं । बालि तो केवल मेरे शरीर के पिता थे, पर परमपिता श्रीराम तो समस्त प्राणीमात्र की अन्तरात्मा हैं । रावण ! श्रीराम के साथ मेरा जो भावनात्मक संबंध है, उतना तो पिताजी के साथ भी नहीं । तात्पर्य यह कि शरीर का नाता तो एक जन्म का है, पर ईश्वर का नाता तो शाश्वत है ।

Sunday, 11 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

अंगद का हाथ पकड़कर बालि ने श्रीराम से कहा था कि आप अंगद का हाथ पकड़ लीजिए । यहाँ पर हमें अन्तिम क्षणों में बालि की चतुराई का परिचय मिलता है और यह चतुराई पूरे जीवनभर अंगद को उत्तराधिकार के रूप में मिली रही । अंगद को बुलाकर बालि यह भी कह सकता था कि प्रभु के चरणों को कसकर पकड़ लो, पर यह बिल्कुल नहीं कहा, बल्कि भगवान से कहा कि महाराज, आप इसका हाथ पकड़ लीजिए । अंगद से क्यों नहीं कहा कि चरण पकड़ लो ? बालि का तात्पर्य यह था, महाराज ! यदि जीव पकड़ेगा तो छोड़ भी सकता है, पर आप पकड़ेंगे तो छूटने का डर नहीं है । इसलिए हम अंगद से क्यों कहें कि वह आपको पकड़े, हम तो आपसे कहेंगे कि आप अंगद को पकड़ लीजिए ।

Saturday, 10 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

लक्ष्मणजी भगवान राम की सेवा किस तरह कर रहे हैं ? गोस्वामीजी कहते हैं कि हम लोगों से अधिक सेवा नहीं कर रहे हैं । कैसे ? जैसे अज्ञानी व्यक्ति शरीर की पूजा करता है, वैसे ही लक्ष्मणजी श्रीराम की सेवा कर रहे हैं । लंका का हर व्यक्ति रात-दिन देह की ही पूजा में लगा है । हनुमानजी ने सारी लंका को जला क्यों दिया ? गोस्वामीजी ने जीवन के सत्य को प्रकट कर दिया कि देह-देवता की आप चाहे जीवन भर पूजा कीजिए, पर अन्त में उसको जलाना ही पड़ेगा । जलाने को छोड़कर उस देवता की अन्तिम परिणति और कुछ नहीं है । हनुमानजी लंका को जलाकर जीवन के उस सत्य को उद्घाटित कर देते हैं । इसका अभिप्राय यह है कि या तो देवता राम हैं या शरीर । गोस्वामीजी कहते हैं, या तो ममता का त्याग करो या ममता श्रीराम से करो ।

Friday, 9 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी लंका के लिए बड़े ही विचित्र शब्द का प्रयोग करते हैं । लंका में जितने घर हैं, उनको उन्होंने मंदिर लिखा । वैसे शब्दकोष में मन्दिर घर को भी कहते हैं, पर गोस्वामीजी घर के लिए कहीं-कहीं मन्दिर, कहीं भवन, कहीं घर लिख देते तो दूसरी बात होती, पर उन्होंने लंका के घरों के लिए केवल मन्दिर शब्द का ही प्रयोग किया । पर जिसमें विभीषणजी रहते हैं, उसे भवन कहा । सारे राक्षस रहते हैं मन्दिर में और जहाँ विभीषण रहते हैं, वह घर कहा गया । पर इतना ही नहीं, जब हनुमानजी लंका जलाने लगे तो गोस्वामीजी को वही शब्द याद रहा । हनुमानजी किसको जला रहे हैं ? सारे मन्दिरों को जला रहे हैं, पर विभीषण का घर नहीं जलाया । इसमें एक बहुत बड़ा व्यंग्य है । मन्दिर माने जहाँ किसी देवता की पूजा हो रही हो । वह देवता कौन है ? पूजा या तो चैतन्य-तत्व की होगी या फिर जिस देवता की पूजा लंका में चलती है, वह यदि हम लोग अपने जीवन की ओर देखें, तो दिखाई दे जायेगी । हम लोगों के मन्दिर के देवता कौन हैं ? लंका के मन्दिरों का देवता तो शरीर है और उस शरीर-देवता की सेवा-पूजा करना लंका का नित्य-निरंतर का कार्य है । और यह हम लोगों के जीवन में भी चल रहा है ।