Friday, 9 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .......

गोस्वामीजी लंका के लिए बड़े ही विचित्र शब्द का प्रयोग करते हैं । लंका में जितने घर हैं, उनको उन्होंने मंदिर लिखा । वैसे शब्दकोष में मन्दिर घर को भी कहते हैं, पर गोस्वामीजी घर के लिए कहीं-कहीं मन्दिर, कहीं भवन, कहीं घर लिख देते तो दूसरी बात होती, पर उन्होंने लंका के घरों के लिए केवल मन्दिर शब्द का ही प्रयोग किया । पर जिसमें विभीषणजी रहते हैं, उसे भवन कहा । सारे राक्षस रहते हैं मन्दिर में और जहाँ विभीषण रहते हैं, वह घर कहा गया । पर इतना ही नहीं, जब हनुमानजी लंका जलाने लगे तो गोस्वामीजी को वही शब्द याद रहा । हनुमानजी किसको जला रहे हैं ? सारे मन्दिरों को जला रहे हैं, पर विभीषण का घर नहीं जलाया । इसमें एक बहुत बड़ा व्यंग्य है । मन्दिर माने जहाँ किसी देवता की पूजा हो रही हो । वह देवता कौन है ? पूजा या तो चैतन्य-तत्व की होगी या फिर जिस देवता की पूजा लंका में चलती है, वह यदि हम लोग अपने जीवन की ओर देखें, तो दिखाई दे जायेगी । हम लोगों के मन्दिर के देवता कौन हैं ? लंका के मन्दिरों का देवता तो शरीर है और उस शरीर-देवता की सेवा-पूजा करना लंका का नित्य-निरंतर का कार्य है । और यह हम लोगों के जीवन में भी चल रहा है ।

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