भगवान राम जब अंगद को अयोध्या से विदा करने लगे, तब उन्होंने प्रार्थना की कि वे उन्हें अयोध्या में ही अपनी सेवा में रख लें । प्रभु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की और बोले कि तुम किष्किन्धा जाओ, अवश्य जाओ, यही उचित है और वहाँ युवराज के रूप में राज्य चलाओ । उस समय अंगद की हिचकिचाहट देखकर भगवान को लगा कि इसकी वह मनोग्रन्थि मिट नहीं रही है कि सुग्रीव मेरे विरोधी हैं और उसे मिटाये बिना इन दोनों को मिलाये बिना समग्रता नहीं आयेगी । अतः भगवान ने अंगद को विदा तो किया, पर उसके पहले उन्होंने अपने गले की माला निकालकर अंगद के गले में पहना दी । इसका क्या अभिप्राय है ? मानो प्रभु ने कहा कि अंगद, घबराओ मत, तुम्हारे मन में यह जो ग्रन्थि है कि सुग्रीव तुम्हें दण्ड देने के लिए मौके की खोज में रहेंगे, पर विश्वास रखो, तुम्हारे गले में यह मेरी माला देखते ही सुग्रीव को सारी बातें याद आ जायेंगी । बालि और सुग्रीव का जब युद्ध हुआ था, तो तुम्हारे पिता को चेतावनी देने के लिए मैंने सुग्रीव को माला पहनाई थी और आज तुम्हें भी पहना रहा हूँ । सुग्रीव से बढ़कर भला इस माला का चमत्कार कौन जानता है ? इसलिए तुम विश्वास रखो, यह एक ऐसा सूत्र है, जिसके आधार पर सुग्रीव कोई भूल नहीं कर सकते । देह के नाते से तुम्हारी दूरी बनी रहेगी, पर मेरे नाते जब जब तुम नाता जोड़ोगे कि तुम मेरे प्रिय भक्त हो और सुग्रीव भी मेरा प्रिय सखा है, इस नाते से तुम्हारा यह चाचा-भतीजे का संस्कार मिटेगा, तुम्हारी आपसी दूरी मिटेगी ।
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