Monday, 12 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

यदि अंगद को लगता कि बालि मेरे पिता हैं, मैं उनका पुत्र हूँ, मेरा जन्म उनसे हुआ है और मेरे पिता को मारने वाले श्रीराम मेरा शत्रु हैं, तब तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होती, पर वे सचमुच ही देहाभिमान से ऊपर उठे हुए थे, देह की ममता से मुक्त हो चुके थे । उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ रावण से कहा कि मैं समझ गया, तुम बड़े राजनीतिज्ञ की तरह मुझे राम से अलग करना चाहते हो, लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि राम को मैंने एक व्यक्ति की तरह कभी नहीं देखा - श्रीराम कोई व्यक्ति नहीं हैं । वे तो अन्तरात्मा के रूप में सभी प्राणियों के अन्तर में निवास करते हैं । बालि तो केवल मेरे शरीर के पिता थे, पर परमपिता श्रीराम तो समस्त प्राणीमात्र की अन्तरात्मा हैं । रावण ! श्रीराम के साथ मेरा जो भावनात्मक संबंध है, उतना तो पिताजी के साथ भी नहीं । तात्पर्य यह कि शरीर का नाता तो एक जन्म का है, पर ईश्वर का नाता तो शाश्वत है ।

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