हनुमानजी सुग्रीव को भगवान से मिलाते हैं । वहाँ एक बात देखते हैं कि भगवान जब सुग्रीव से वार्तालाप करते हैं और हनुमानजी से जो बातें करते हैं, इन दोनों में बड़ी भिन्नता है । जब हनुमानजी से प्रभु का मिलन हुआ, तब भगवान उन्हें अनन्य भक्ति के स्वरूप का उपदेश देते हैं । प्रभु कहते हैं कि भक्ति तो अनन्य होनी चाहिए और हनुमान ! जो समस्त ब्रह्मांड को मेरा ही रूप मानकर और अपने को सेवक मानकर सबकी सेवा करता है, वही अनन्य भक्ति है और मुझे विश्वास है कि तुम्हारे जीवन में वही अनन्य भक्ति विद्यमान है । प्रभु जब हनुमानजी से बातें करते हैं, तब स्तर यह है, पर जब वे सुग्रीव से मिलते हैं, तब उन्हें भक्ति का उपदेश नहीं देते, ज्ञान-विज्ञान की बातें नहीं करते, वे ऐसी कोई भी आध्यात्मिक या पारमार्थिक बात नहीं करते, जो सामान्य धरातल से ऊपर की हो । बल्कि प्रभु बड़ी व्यावहारिक बातें बताते हुए कहते हैं कि सुग्रीव आज से हम तुम मित्र हो गए, मित्र को चाहिए कि न तो देने में संकोच करे और न लेने में । हनुमानजी से वे लेन-देन की बात नहीं करते, पर सुग्रीव से लेन-देन की बात में भी संकोच नहीं करते । इसका क्या तात्पर्य है ? हनुमानजी तो लेने वाले हैं नहीं ; बस देने वाले हैं, यदि सुग्रीव से भी यह कह दिया जाय कि देना ही भक्ति है, तब तो सुग्रीव भक्ति से बहुत दूर हो जाते ।
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