Thursday, 15 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ......

साधारण दृष्टि से देखने पर तो सभी एक जैसे दिखाई देते हैं, परन्तु मन और अन्तःकरण के संस्कार और उसकी बनावट पर दृष्टि डालें तो देखेंगे कि उसमें भिन्नता है । ऐसी स्थिति में उसका गणित के समान कोई निश्चित नियम नहीं है कि जिसमें यह कहा जा सके कि हर व्यक्ति के जीवन में इसी क्रम को स्वीकार करना चाहिए । अपितु इसका उत्तर यही है कि वस्तुतः अधिकारी भेद से व्यक्ति के अन्तःकरण का जैसा निर्माण हुआ है, उसी के अनुरूप साधना-पद्धति स्वीकार करनी चाहिए ।

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