Saturday, 17 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

यदि हम हनुमानजी के चरित्र पर दृष्टि डालें तो उनके जीवन में पारिवारिक व्यवहार का कोई चित्र सामने नहीं आता । हनुमानजी बाल-ब्रह्मचारी हैं और सर्वतोभावेन श्रीराम की सेवा में समर्पित हैं । दूसरी ओर सुग्रीव जैसे लोग भी हैं, जिनके जीवन में उपरामता नहीं, बल्कि विषयासक्ति है । ऐसी स्थिति में मानस में यह जो समन्वय की पद्धति है, उसका सर्वश्रेष्ठ परिचय हनुमानजी और सुग्रीव के सम्बन्ध में मिलता है । साधारणतया जो व्यक्ति विषयी होता है, उसकी मित्रता भी विषयी लोगों में होती है और उसी प्रकार जो व्यक्ति विषयों से उपराम अर्थात वैराग्यवान है, उसकी संगति भी वैराग्यवानों से होती है, पर हनुमानजी और सुग्रीव के चरित्र में एक बड़ी विचित्रता है कि सुग्रीव के चरित्र में वैराग्य व उपरामता तो नहीं है, पर उनके विश्वास-पात्र हनुमानजी वैराग्यवान हैं । यह सुग्रीव के चरित्र का एक विचित्र पक्ष है कि विषयी होते हुए भी उनकी श्रद्धा और विश्वास की वृत्ति वैराग्यवान के प्रति है और यही भविष्य में सुग्रीव के कल्याण का कारण बनती है ।

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