Sunday, 18 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच .....

हनुमानजी स्वयं परम वैराग्यवान होकर भी सुग्रीव जैसे व्यक्ति को सम्मान या महत्व देने में उनको रंचमात्र भी हिचकिचाहट नहीं होती । वे सुग्रीव के पास रहकर निरन्तर प्रसन्न दिखाई देते हैं । यह जो हनुमानजी और सुग्रीव की वृत्ति है, इस दृष्टि से भी बड़ी हितकर है कि भले ही हमारे जीवन में दुर्बलताएँ हों, पर इसके बाद भी यदि हम ऐसे लोगों के पास रहेंगे या उनसे मित्रता जोड़ेंगे, जिनमें बड़ी दुर्बलताएँ विद्यमान हैं, तो इसके स्वाभाविक परिणामस्वरूप उस दुर्बलता को और भी अधिक बढ़ावा मिलेगा । ऐसे व्यक्तियों के संपर्क में हमारी दुर्बलताएँ और भी बढ़ेंगी । परन्तु स्वयं में दुर्बलता होते हुए भी जब हमारी श्रद्धा और आदर का केन्द्र कोई वैराग्यवान महापुरुष होता है, तो मन से भले ही वह व्यक्ति रोगी हो, पर बुद्धि से उसके मन में वैराग्य के प्रति श्रद्धा है ।

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