Wednesday, 14 February 2018

युग तुलसी श्री रामकिंकर उवाच ....

भगवान राम ने सुग्रीव को यह कहा था कि तुम्हें श्रीसीताजी का पता लगाना है, यह परम आवश्यक कार्य है । यह जो सूत्र श्रीराम ने सुग्रीव को दिया, वह सूत्र तो संसार के हर व्यक्ति के लिए है, क्योंकि हमारे आपके जीवन में इस प्रकार के प्रश्न आते हैं, इस प्रकार की समस्याएँ आती हैं । वह यह है कि एक ओर तो सांसारिक कार्य हैं, व्यावहारिक स्वार्थ के कार्य हैं और दूसरी ओर सत्संग में भक्ति और ज्ञान की महिमा और ईश्वर या भक्ति की प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य बनाया जाता है । ऐसी स्थिति में व्यक्ति कभी-कभी स्वयं को बड़ी उलझन में पाता है कि कैसे इन दोनों का क्रम से निर्वाह किया जाए । या तो इसका अर्थ यह लिया जा सकता है कि पहले हम व्यावहारिक जीवन की समस्या को सुलझा लें और उसके बाद परमार्थ की प्राप्ति की चेष्टा करें या दूसरा सूत्र यह है कि व्यावहारिक समस्या में उलझने के बाद तो व्यक्ति परमार्थ की दिशा से विरत हो जाता है, अतः व्यवहार की उपेक्षा करके हमें जीवन के चरम लक्ष्य को पाने की चेष्टा करनी चाहिए । मानस में इसका जो उत्तर दिया गया, वह उत्तर एक रूप में नहीं दिया गया । भिन्न-भिन्न प्रसंगों में इस प्रश्न के भिन्न-भिन्न उत्तर दिये गये हैं । तात्पर्य यह है कि अलग-अलग प्रकार के व्यक्ति के लिए उत्तर भी अलग-अलग हैं ।

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